अंग्रेजों और मैसूर राज्य के बीच हुए युद्धों का वर्णन करें

अंग्रेजों और मैसूर राज्य के बीच हुए युद्ध

ईस्ट इंडिया कंपनी के द्वारा भारत में अंग्रेजों के आगमन के बाद अंग्रेजों के द्वारा भारतीय विभिन्न भारतीय शासकों पर आक्रमण और उनके साम्राज्य पर कब्जे करने की लगातार कोशिश जारी रही. ऐसे में भारतीय शासकों और अंग्रेजों के बीच युद्धों का सिलसिला शुरू हो गया. इसी दौरान मैसूर राज्य और अंग्रेजों के बीच भी लड़ाई छिड़ गई. अंग्रेजों और मैसूर राज्य के मध्य चार युद्ध लड़े गए. इन युद्धों को आंग्ल-मैसूर युद्ध के नाम से जाना जाता है.

अंग्रेजों और मैसूर राज्य के बीच हुए युद्धों

आंग्ल-मैसूर युद्ध

1. प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध

प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767-69 ई.) अंग्रेजों और हैदर अली के बीच हुई थी. युद्ध का मुख्य कारण ये थी कि अंग्रेज और हैदर अली दोनों अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करना चाहते थे. ऐसे में दोनों की हितें आपस में टकराने लगी थी. अंग्रेज भी भली-भांति समझ गए थे कि हैदर अली की शक्ति को कमजोर किए बिना वे दक्षिण भारत में अपना प्रभाव स्थापित करने में सफल नहीं हो पाएंगे. अत: वे हैदर अली को कुचलने के लिए तरह-तरह की तरकीबें अपनाने लगे. ऐसे में हैदर अली को भी अपने राज्य की सुरक्षा के लिए अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध करने पर मजबूर होना पड़ा. हैदर अली के विरुद्ध अंग्रेजो के द्वारा मराठों और हैदराबाद के निजाम के साथ भी सांठ-गांठ करना हैदर अली की आंखों में खटकता था. हालांकि वह अपनी सूझबूझ के कारण उनके इस सांठ-गांठ को तोड़ने में सफल रहा, लेकिन अंग्रेजों की ओर से हुआ सतर्क हो गया. इधर हैदर अली ने भी अंग्रेजों का सामना करने के लिए फ्रांसीसियों के साथ संबंध स्थापित कर लिए थे. वह अपनी सेना को प्रशिक्षण करने के लिए फ्रांसीसी अधिकारियों को नियुक्त कर रखा था. ये बात अंग्रेजों के लिए असहनीय था.

अंग्रेजों और मैसूर राज्य के बीच हुए युद्धों

इन सब की वजह से दोनों के बीच युद्ध की शुरुआत हुई. युद्ध के शुरुआती शुरुआत में अंग्रेजों को थोड़ी-बहुत सफलता मिली, लेकिन बाद में हैदर अली उनको चारों ओर से घेरना आरंभ कर दिया. उसकी सेना मद्रास तक पहुंच गई. इस करण अंग्रेज हताश हो गए और घबराकर हैदर अली के साथ 4 मई 1769 ई. को एक संधि कर ली. इस संधि के अनुसार दोनों ने एक-दूसरे के जीते हुए प्रदेशों को लौटा दिया. इसके अतिरिक्त अंग्रेजों ने हर्जाने के रूप में हैदर अली को बहुत साधन दिया. उन्होंने भविष्य में किसी बाहरी शक्ति के आक्रमण पर दोनों ने एक-दूसरे को सहायता देने का वचन दिया. इस प्रकार प्रथम आंगल मैसूर युद्ध खत्म हुआ.

2. द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780-83 ई.)

यह युद्ध भी अंग्रेजों और हैदर अली के बीच हुई थी. इस युद्ध के कई कारण थे. प्रथम आंग्ल-मैसूर भले ही एक संधि के तहत खत्म हुई, लेकिन अंग्रेजों के द्वारा इस संधियों का पालन नहीं किया गया. मराठों के द्वारा हैदर अली पर आक्रमण करने पर उसने संधि के तहत अंग्रेजों से मदद मांगी, लेकिन अंग्रेजों ने उसका साथ नहीं दिया. उसने इस विश्वासघात का बदला लेने का निश्चय किया. इसके बाद अंग्रेजों और हैदर अली के बीच कभी भी विश्वास बहाल नहीं हो पाई. अंग्रेज भी हैदरअली के कट्टर शत्रु मराठों और हैदराबाद के निजाम से मित्रता बनाए रखते थे. ये बातें हैदरअली को फूटी आंखें नहीं सुहाती थी. 

अंग्रेजों और मैसूर राज्य के बीच हुए युद्धों

1780 के मध्य हैदर अली ने अपनी विशाल सेना लेकर कर्नाटक पर भीषण हमला किया. उसकी सेना ने भीषण लूट-मार मचाई. इससे घबराकर अंग्रेज इधर-उधर भागने लगे. युद्ध में अंग्रेज सेनापति कर्नल बैली और मुनरो को बुरी तरह पराजित होकर भागना पड़ा. इसके बाद संपूर्ण कर्नाटक पर हैदर अली का अधिकार हो गया. इस हार के बाद भी अंग्रेज अधिकारी वारेन हेस्टिंग्ज ने हिम्मत नहीं छोड़ी. उसने अपने सेनापति सर आयरकूट को हैदर अली का सामना करने के लिए दक्षिण भेजा. इसके साथ ही उसने कूटनीति का भी सहारा लिया और हैदर अली के साथियों को उससे अलग कर दिया. इस वजह से हैदर अली को भी कई जगह पराजय का सामना करना पड़ा. हैदर अली को पराजय होते देखकर फ्रांसीसी सेनापति डूचीमन के नेतृत्व में लगभग 2,000 सैनिक फांस से भारत पहुंच गए. हैदर अली और फ्रांसीसियों के संयुक्त सेना ने अंग्रेज सेनापति सर आयरकूट के प्रयासों को असफल कर दिया. युद्ध अभी चल ही रही थी कि दिसंबर 1782 ई. को हैदर अली की मृत्यु हो गई उधर अप्रैल 1782 ई. में सर आयरकूट की भी मृत्यु हो गई थी. हैदर अली की मृत्यु के बाद उसका पुत्र टीपू सुल्तान युद्ध को जारी रखा. उसने मुंबई से आगे बढ़ने वाले ब्रिगेडियर मैथ्यू पर विजय प्राप्त कर उसे अधिकार बना लिया. इसी बीच यूरोप में इंग्लैंड और फ्रांस के बीच 1783 ई. की वार्साय संधि के द्वारा शांति स्थापित हो गई. इस कारण फ्रांस को युद्ध से हटना पड़ा. कुछ समय तक टीपू सुल्तान और अंग्रेजों के बीच में युद्ध चलता रहा.  अंत में दोनों युद्ध करते-करते थक गए और मार्च 1783 ई. में दोनों में मंगलूर की संधि करके युद्ध को खत्म किया. इस संधि के तहत दोनों ने एक-दूसरे के जीते हुए प्रदेश वापस कर दिए और युद्ध बंदियों को लौटा दिया.

अंग्रेजों और मैसूर राज्य के बीच हुए युद्धों

3. तीसरा आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790-92 ई.)

तीसरा आंग्ल मैसूर युद्ध अंग्रेजों और टीपू सुल्तान के बीच लड़ा गया था.  द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध मंगलोर की संधि के बाद खत्म हो गई थी, लेकिन फिर भी दोनों के बीच में पूरी तरह शांति स्थापित नहीं हो पाया था. दोनों एक-दूसरे पर कभी भरोसा नहीं करते थे तथा एक-दूसरे के विरुद्ध गुप्त रूप से युद्ध की तैयारी करते रहे. ऐसे में दोनों के बीच युद्ध होना तय था. टीपू सुल्तान फ्रांसीसियों से लगातार गठबंधन बनाते रहे जो कि अंग्रेजों को बिल्कुल पसंद नहीं थी. इधर अंग्रेजों ने भी टीपू सुल्तान के विरुद्ध मराठों और हैदराबाद के निजाम से संधि कर रखे थे. ऐसे में युद्ध होना तय था.

अंग्रेजों और मैसूर राज्य के बीच हुए युद्धों

इस युद्ध में हैदराबाद के निजाम तथा मराठे अपने स्वार्थ को लेकर अंग्रेजों की तरफ से लड़े.  युद्ध की शुरुआत में अंग्रेजों को भी कोई सफलता नहीं मिल पा रही थी. ऐसे में अंग्रेजी सेना को कार्नवालिस ने संचालन करना शुरू कर दिया. उसकी सेना 1791 ई. में बैंगलोर पर अधिकार करने के बाद टीपू सुल्तान की राजधानी श्री रंगपट्टनम के नजदीक पहुंच गई.  इसके बाद अंग्रेज कोयंबटूर पर भी अधिकार कर लिए. धीरे-धीरे टीपू सुल्तान के सभी दुर्गों पर अंग्रेजों का अधिकार होने लगा और टीपू सुल्तान पराजित होने लगा. अंत में उसकी राजधानी श्रीरंगपट्टनम को भी अंग्रेजों ने घेर लिया. अतः विवश होकर टीपू सुल्तान को मार्च 1792 ई. में अंग्रेजों के साथ संधि करनी पड़ी. टीपू सुल्तान के लिए यह हार बहुत ही दुखद रही. उसे लगभग अपने आधे राज्य से हाथ धोना पड़ गया जिसे अंग्रेजों, मराठों और हैदराबाद के निजाम ने आपस में बांट लिया. इसके अलावा युद्ध क्षतिपूर्ति के लिए उसे बहुत सा धन अंग्रेजों को देना पड़ा.

4. चौथा आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799 ई.)

यह युद्ध भी टीपू सुल्तान और अंग्रेजों के मध्य लड़ा गया. दरअसल मैसूर के तृतीय युद्ध के बाद अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान के साथ अत्यंत अपमानजनक व्यवहार किया था. उन्होंने हर्जाने के साथ-साथ टीपू सुल्तान के दो पुत्रों को भी बंधक बना लिया था. इसी अपमान का बदला लेने के लिए वह अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध की तैयारी करने लगा. उसने अंग्रेजों के विरुद्ध फ्रांसीसियों के साथ भी गठबंधन करना शुरू कर दिया. यह देखकर अंग्रेज भी टीपू सुल्तान के साथ युद्ध की तैयारी करने लगे.

अंग्रेजों और मैसूर राज्य के बीच हुए युद्धों

मार्च 1799 ई. में वेलेजली ने टीपू सुल्तान के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी. उसने स्वयं युद्ध का संचालन किया. अंग्रेजी सेना ने पूर्वी तथा पश्चिमी दोनों दिशाओं से मैसूर पर आक्रमण कर किया. दोनों ओर से आक्रमण करने वाली अंग्रेजी सेनाओं के साथ युद्ध में टीपू सुल्तान की सेना को पराजित होना पड़ा. विवश होकर टीपू ने अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टनम में शरण ली. अंग्रेजों ने उसकी राजधानी को भी घेर लिया. इसके बाद अंग्रेजों ने उससे संधि करने की शर्त रखी. लेकिन टीपू सुल्तान ने उनकी संधि की शर्तों को अस्वीकार कर दिया और अंत में मार्च 1799 ई. में टीपू सुल्तान अंग्रेजों से युद्ध करते हुए मारा गया. इस युद्ध में जीतने के बाद अंग्रेजों की शक्ति में काफी वृद्धि हुई. अब संपूर्ण मैसूर राज्य पर ब्रिटिश सरकार का अधिकार हो गया.

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