कैबिनेट मिशन योजना तथा उसके महत्व का वर्णन कीजिए

कैबिनेट मिशन योजना

1946 ई. में इंग्लैंड में महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन हुए. इसका प्रभाव भारत पर भी पड़ना स्वभाविक था. चर्चिल के स्थान पर मजदूर दल के नेता एटली इंग्लैंड के प्रधानमंत्री बने. भारत के प्रति एटली का दृष्टीकोण चर्चिल से भिन्न था. इसके अलावा भारत मंत्री के पद पर भी मजदूर दल के सदस्य पैथिक लॉरेंस नियुक्त किए गए. एटली और लॉरेंस के समय भारत के विषय में उनके पास दो विकल्प थे. पहले यह कि जैसा कि चर्चिल का विचार था कि अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए भारत में ब्रिटिश शासन कायम रखा जाए. दूसरा यह कि सरकार को भारत की स्वतंत्रता की मांग को स्वीकार कर लेना चाहिए. प्रधानमंत्री एटली दूसरे विकल्प में विश्वास रखते थे. एटली के विचारधारा का कारण भारत की तत्कालीन स्थिति थी. इस स्थिति को देखते हुए दूरदर्शी एटली यह समझ चुके थे कि शक्ति के द्वारा भारत में अंग्रेजी शासन अधिक दिनों तक चलाए रखना संभव नहीं. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान आजाद हिंद फौज द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ना तथा भारत में नौसेना और वायु सेवा के द्वारा विद्रोह किया जाना भी कुछ ऐसी घटनाएं थी जिसके कारण एटली को यह विचारधारा अपनाने के लिए विवश होना पड़ रहा था. इन घटनाओं से यह स्पष्ट हो गया था कि भारतीय सैनिक अपने भारतीय नागरिकों पर गोली चलाने का आदेश का पालन हर वक्त नहीं करेंगे. यह भी संभव नहीं था कि संपूर्ण भारत में अंग्रेजी सेना को स्थापित किया जाए. गांधी जी का भी विचार था कि यदि अत्याचार सहने वाला तैयार नहीं हो तो अत्याचार करने वाला  भी अत्याचार नहीं कर सकता. जब भारतीय सैनिकों ने अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाई तो अंग्रेजों को झुकने के लिए मजबूर होना पड़ा.  वायसराय के संवैधानिक परामर्शदाता बीपी मेनन ने लिखा है कि लॉर्ड वेवेल को यह विश्वास था कि कांग्रेस के साथ संघर्ष में वह आमतौर पर सरकारी अधिकारियों, पुलिस और सेना की सहायता पर निर्भर रह सकता है, परंतु भारतीय सेना को अपने देशवासियों को कुचलने में अधिक समय तक नहीं आजमाया जा सकता. वह जानता था कि जैसे-जैसे समय बीतता जाएगा, भारतीय अधिकारियों, सैनिकों और पुलिस की ब्रिटिश सरकार के वफादारी कम होती चली जाएगी. आजाद हिंद फौज के अधिकारियों पर मुकदमा के समय जिस प्रकार भारतीयों के द्वारा उनका समर्थन किया गया था उनसे भी एटली भली भांति परिचित था.  इसके अतिरिक्त भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान प्रमुख कांग्रेसी नेताओं को जेल में डाल दिए जाने तथा सरकारी दमन के पश्चात भी ब्रिटिश शासन के प्रति जनता के आक्रोश से यह स्पष्ट हो गया था कि भारतीय अब अंग्रेजों का अत्याचार और बर्दाश्त करने के पक्ष में नहीं हैं.

कैबिनेट मिशन योजना तथा उसके महत्व

किसानों, मजदूर वर्ग ने भी ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध आंदोलन में महत्वपूर्ण भाग लिया था.  तेलंगाना, तेभाग जैसे क्षेत्रों में हुए किसानों के संघर्ष भी ऐतिहासिक सिद्ध हुए. इसके अतिरिक्त पंजाब,  संयुक्त प्रांत, बिहार और महाराष्ट्र में भी किसान आंदोलन जोरों से चले थे. मजदूर आंदोलन का रूप दिन-प्रतिदिन तीव्र होता जा रहा था. 1946-47 ई. में अंग्रेजों के खिलाफ संपूर्ण भारत में जगह-जगह हड़तालें हुई और प्रदर्शन किए गए. 1946 ई. में रेलवे हड़ताल ने उग्र धारण कर लिया था. इस प्रकार द्वितीय महायुद्ध समाप्ति के समय भारत में जनता के विभिन्न वर्ग के लोग स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े थे. इनमें मुख्य रूप से मजदूर, किसान, छात्र, कारीगर, दस्तकार, व्यापारी आदि अपने-अपने तरीकों से साम्राज्यवाद और साम्राज्यवादियों का विरोध कर रहे थे. 1946 ई. में हुए चुनाव में कांग्रेस की भारी जीत ने भी भारतीयों के इरादों को व्यक्त कर दिया था. इसके अतिरिक्त द्वितीय विश्वयुद्ध में यद्यपि इंग्लैंड विजय हुआ किंतु इस युद्ध का इंग्लैंड पर गंभीर आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव हुए थे. इंग्लैंड की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही थी तथा राजनीतिक रूप से भी उसका स्थान विश्व में सर्वोच्च नहीं रहा. कुल मिलाकर इंग्लैंड की स्थिति अच्छी नहीं थी. अतः एटली ने  इन समस्त बातों को ध्यान रखते हुए मार्च 15 मार्च 1946 ई.  को एक महत्वपूर्ण घोषणा की. इस घोषणा के अनुसार उसने भारतीयों के आत्मनिर्णय के और संविधान निर्माण के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया. भारतीय को ब्रिटिश राष्ट्रमंडल में रहने अथवा न रहने की भी छूट दी गई. इस घोषणा में एटली ने यह भी कहा  कि हम अल्पसंख्यकों के अधिकार के बारे में सजक है, परंतु हम बहुसंख्यकों की प्रगति को रोकने के लिए वीटो नहीं दे सकते. कांग्रेस द्वारा इस घोषणा का स्वागत किया गया. जिन्ना को इससे घोर निराशा हुई. पहली बार जिन्ना को यह अनुभव हुआ कि इंग्लैंड की सरकार उसकी सहमति के बिना भी सत्ता के हस्तांतरण के लिए तैयार है.

कैबिनेट मिशन योजना तथा उसके महत्व

15 मार्च 1946 ई. को ही प्रधानमंत्री एटली ने यह भी घोषणा की कि ब्रिटिश सरकार भारत के सांप्रदायिक एवं राजनीतिक गतिरोध को दूर करने के लिए कैबिनेट मिशन भारत भेजेगा. इस कैबिनेट मिशन के सदस्य भारत मंत्री लॉरेंस, सर क्रिप्स तथा ए. बी.  एलेक्जेंडर होंगे.  ये तीनों सदस्य 23 मार्च 1946 ई. को भारत पहुंचे और भारत के विभिन्न दलों और नेताओं से विचार-विमर्श किया. सांप्रदायिकता के मामले पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग में समझौता न होने के कारण कैबिनेट मिशन ने स्वयं एक योजना प्रस्तुत करते हुए कहा कि हमने मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की मांग पर विचार किया. हमारा यह विचार  किया कि इससे सांप्रदायिक समस्या हल नहीं होगी. न्यायोचित दृष्टि से हम पंजाब, बंगाल और असम के उन जिलों को जिसमें हिंदुओं का बहुमत है, उसे पाकिस्तान में शामिल करना उचित नहीं समझते. भारत भौगोलिक दृष्टि से अखंड है. अतः पाकिस्तान की मांग को अस्वीकार करते हैं. कैबिनेट मिशन के सदस्यों को मानना था कि पाकिस्तान की मांग स्वीकार करने का अर्थ है जनता की इच्छा के विरुद्ध पंजाब और बंगाल का विभाजन होगा. पंजाब के सिख भी दो भागों में बंट जाएंगे.  इसके अतिरिक्त पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान में बहुत दूरी होगी जो कि प्रशासकीय असुविधा के कारण बनेगी.

कैबिनेट मिशन योजना तथा उसके महत्व

कैबिनेट मिशन योजना की प्रमुख बिंदुएं

  • भारतीय संघ की स्थापना की जाए जिसमें भारतीय राज्य एवं प्रांत सम्मिलित हो.  इस संघ पर प्रतिरक्षा, वैदेशिक संबंध तथा संचार व्यवस्था का उत्तरदायित्व होगा. शेष विषयों पर प्रांतों और राज्यों का अधिकार होगा.
  • संविधान निर्माण के लिए संविधान सभा का गठन किया जाएगा. इसमें संख्या के आधार पर प्रत्येक प्रांत को स्थान दिए जाएंगे. मतदाताओं को तीन वर्ग- आम, मुसलमान और सिख (सिर्फ पंजाब में) होंगे.
  • प्रांतों को तीन समूहों में रखा जाएगा- वर्ग ए में मद्रास, मुंबई संयुक्त प्रांत,  बिहार, मध्य प्रांत और उड़ीसा. वर्ग बी में पंजाब, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत तथा सिंध. वर्ग सी में बंगाल और असम. तीनों वर्गों प्रति के प्रांतों के प्रतिनिधि अपने वर्ग तथा प्रांत के लिए संविधान का निर्माण करेंगे.
  • इस प्रकार तैयार किए गए संविधान को ब्रिटिश सरकार लागू करेगी.
  • सत्ता हस्तांतरण के पश्चात भारतीय राज्यों से संबंधित सर्वोच्च शक्ति न ब्रिटेन के पास रहेगी और न भारत के पास.
  • सभी दलों की सहायता से एक अंतरिम सरकार बनाई जाएगी जिसके सभी विभाग भारतीय नेताओं का अधीन होंगे.

कैबिनेट मिशन का महत्व

  • कैबिनेट मिशन के इस योजना में कुछ महत्वपूर्ण गुण थे. सबसे अच्छी बात यह है कि जैसा कांग्रेस भी चाहते थे कि इसके द्वारा पाकिस्तान की मांग को स्वीकार नहीं किया गया था. इस प्रकार भारत की राजनीतिक एकता को सुरक्षित रखा गया था. इसी कारण गांधी जी जो कि पाकिस्तान बनाने के विरोधी थे, उसने भी इसकी प्रशंसा की तथा हरिजन में लिखा कैबिनेट मिशन के प्रस्ताव में वे बीज मौजूद हैं जो इस देश को ऐसा महान बना देंगे जिसमें कष्ट और दुख का नाम न होगा.
  • दूसरी ओर प्रांतों को संप्रदाय के आधार पर वर्गों में विभाजित करके मुस्लिम लीग को भी प्रसन्न करने का प्रयत्न किया गया था. इस योजना के द्वारा संविधान सभा को लोकतांत्रिक आधार प्रदान करते हुए उसमें भारतीय सदस्यों के प्रवेश निर्धारित किया गया था. इस योजना के द्वारा सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व को कम करने के लिए रियासतों की जनता की अधिकारों को मान्यता प्रदान करने तथा पहली बार भारतीयों को अपने भविष्य के निर्माण का अवसर प्रदान किया गया. इस प्रकार इस योजना के द्वारा कांग्रेस और मुस्लिम लीग की नीतियों के मध्य का मार्ग निकाल कर दोनों को प्रसन्न करने का प्रयत्न किया गया था.

इस योजना का वामपंथी नेताओं ने कटु आलोचना की. कम्युनिस्ट दल के नेता पी. सी. जोशी ने इसकी आलोचना करते हुए कहा कि यह भारत को अपने सबसे बड़े औपनिवेशिक आधार के रूप में बनाए रखने की ब्रिटेन की शाही योजना है. कैबिनेट मिशन की योजना का सबसे प्रमुख दोष यह था कि इसमें प्रांतों को खंड बनाए जाने के लिए कहा गया था. इस विषय पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग एक मत नहीं थे. यद्यपि पाकिस्तान की मांग को पूर्णतया स्वीकार नहीं किया गया किंतु अप्रत्यक्ष रूप से इसे स्वीकार कर पंजाब के सिखों को इस योजना ने चिंता में डाल दिया था. उन्होंने भी यह मांग रखी कि यदि पाकिस्तान बनाया जाएगा तो वे भी स्वतंत्र सिख राज्य की स्थापना करेंगे. बाद में कांग्रेस द्वारा आश्वासन दिए जाने पर वे शांत हो गए. इसके अतिरिक्त इस योजना से केंद्र सदा निर्बल रहता और भारत के विश्व में शक्तिशाली राज्य के रूप में उभर नहीं पाता. प्रांतों को स्वतंत्र रूप से संविधान बनाने की छूट मिलने से भारत में ही अलग-अलग प्रांतों में अलग-अलग शासन व्यवस्था स्थापित होती है जिसे  काफी असुविधा होती.

कैबिनेट मिशन योजना तथा उसके महत्व

25 जून 1946 ई. को कांग्रेस कार्यसमिति ने जवाहरलाल नेहरू के अध्यक्षता में कैबिनेट मिशन योजना को स्वीकार कर लिया. मुस्लिम लीग ने भी पाकिस्तान न बनाए जाने के कारण क्षोभ प्रकट करते हुए इसे स्वीकार कर लिया. अतः जुलाई 1946 ई. में कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार चुनाव कराए गए. संविधान सभा के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस ने 210 में से 199 सीटें प्राप्त की और ब्रिटिश प्रांतों के लिए 296 में से कांग्रेस ने 211 तथा लीग ने 73 सीट प्राप्त किया. चुनाव में कांग्रेस की अपार सफलता से जिन्ना को घोर निराशा हुई तथा कैबिनेट मिशन योजना को 29 जुलाई 1946 ई. को अस्वीकार करते हुए सीधी कार्यवाही की धमकी दी जो हिंदुओं और सिखों के विरुद्ध होनी थी. कांग्रेस के चुनाव में विजय होने के कारण वायसराय वेवेल ने कांग्रेस का अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू को अंतरिम सरकार बनाने के लिए 12 अगस्त 1946 ई. को आमंत्रित किया. वेवेल और पंडित नेहरू ने मुस्लिम लीग के सदस्यों को सरकार में सम्मिलित करने का प्रयास किया किंतु जिन्ना इस बात के लिए तैयार नहीं थे. इस पर पंडित नेहरू ने 16 अगस्त को सरकार बनाने का फैसला किया. अत: जिन्ना ने भी उसी दिन अर्थात 16 अगस्त 1946 ई. को सीधी कार्यवाही करने की घोषणा की. इसके परिणामस्वरुप पंजाब और बंगाल में अपार जनधन की हानि हुई. 16 अगस्त की स्थिति का वर्णन करते हुए मौलाना आजाद ने इंडिया विंस फ्रीडम में लिखा 16 अगस्त भारत के इतिहास का एक काला दिन था. आकस्मिक रूप से उत्पन्न आतंक, हत्या और खून खराब में शहर डूब गया. सैकड़ों लोगों की जानें चली गई और हजारों लोग घायल हुए. करोड़ों की संपत्ति नष्ट हो गई. इस हत्याकांड में हिंदुओं की अपार क्षति हुई किंतु फिर भी 24 अगस्त 1946 ई. को अंतिम सरकार बनाने की घोषणा की गई. इसमें शामिल किए गए सदस्यों में पंडित जवाहरलाल नेहरू, राजेंद्र प्रसाद, सरदार पटेल,  एम आसफ अली, सी राजगोपालचारी, शरदचंद्र बोस, डॉ. मथायी,  सरदार बलदेव सिंह, शहादत अहमद खां, जगजीवन राम, के. एच. भामा और सैयद अली जौहर आदि प्रमुख थे. वायसराय के प्रयास से मुस्लिम लीग भी 15 अक्टूबर 1946 ई. को अंतरिम सरकार में अपने प्रतिनिधि भेजने को राजी हो गई.  बी.पी. मेनन ने लिखा कि मुस्लिम लीग सरकार में इसलिए शामिल हुई थी क्योंकि उसकी दृष्टि में मुसलमान और अन्य संप्रदायों के हित कांग्रेस के हाथ में छोड़ना ठीक नहीं था. संभवत: जिन्ना कोई विश्वास न था कि वायसराय उसकी सहमति के बिना भी कांग्रेस को सरकार बनाने की अनुमति दे सकता है और कांग्रेस सरकार बन सकती है. किंतु जब ऐसा हो गया तो विवश होकर मुस्लिम लीग को सरकार में शामिल करने में ही जिन्ना ने अपनी और अपने दल की भलाई समझी. यद्यपि मुस्लिम लीग के सदस्य सरकार में सम्मिलित हो गए किंतु कांग्रेस से उसके कभी न पाई. बी.पी. मेनन ने लिखा कि मुस्लिम लीग अंतरिम सरकार में इसलिए सम्मिलित हुई ताकि कांग्रेस की स्थिति मजबूत न हो सके. अतः दोनों में कोई सहयोग उत्पन्न नहीं हो सकता था. वित्त विभाग मुस्लिम लीग के लियाकत अली के पास होने के कारण दोनों दलों की दूरी और बढ़ती चली गई. भारत में जगह-जगह सांप्रदायिक उपद्रव भी हो रहे थे. कोलकाता के पश्चात नोआखाली में भी हिंदुओं पर हमले होने शुरू हो गए. इसके प्रतिक्रियास्वरूप हिंदुओं ने भी अहमदाबाद, बिहार और गढ़मुक्तेश्वर में मुसलमानों पर हमले करना शुरू किए. शीघ्र ही ये दंगे भारत के अन्य भागों में भी फैल गई. ब्रिटिश सरकार ने इससे पूर्व अनेक दंगों को दबाया था किंतु इस अंतरिम सरकार के कार्यकाल में इन दंगों को रोकने की दिशा में कोई प्रयास नहीं किया.

कैबिनेट मिशन योजना तथा उसके महत्व

वायसराय ने 19 दिसंबर 1946 ई.  के संविधान सभा बुलाने का निर्णय लिया किंतु जिन्ना ने इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया. कांग्रेस ने मुस्लिम लीग से अनुरोध किया कि या तो वह संविधान सभा में भाग ले अथवा सरकार से अपने सदस्यों को वापस बुला ले. दोनों दलों में समझौता करने के लिए भारत सचिव ने एक सम्मेलन लंदन में बुलाया जो 3 से 6 दिसंबर तक चला. इसमें प्रधानमंत्री एटली, वेवेल,  जवाहरलाल नेहरू और जिन्ना ने भाग लिया. परंतु यह सम्मेलन भी असफल हो गया. संविधान सभा का अधिवेशन 9 दिसंबर को प्रारंभ हुआ  किंतु उसमें मुस्लिम लीग के 73 सदस्यों में भाग लिया. अतः पंडित नेहरू ने मुस्लिम लीग के सदस्यों से त्यागपत्र देने को कहा. इससे सांप्रदायिक दंगे और भड़क उठे.

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