खिलाफत आन्दोलन से आप क्या समझते हैं?

खिलाफत आंदोलन

खिलाफत आंदोलन धार्मिक कारणों से भारतीय मुसलमानों के द्वारा शुरू किया गया था. 1914 ई. में प्रथम विश्वयुद्ध शुरू हुआ इस युद्ध में तुर्की के सुल्तान ने जर्मनी के साथ मिलकर अंग्रेजो के खिलाफ युद्ध किया. तुर्की के सुल्तान उस समय मुसलमानों के खलीफा हुआ करते थे. ऐसे में मुसलमान असमंजस में पड़ गए क्योंकि यदि भारतीय मुसलमान अंग्रेजों की ओर से इस युद्ध में भाग लेते तो उनको अपने खलीफा के विरुद्ध लड़ना पड़ता और यदि खलीफा का साथ देते तो उन्हें अंग्रेजों से लड़ना पड़ता जो कि उस समय भारत में शासन कह रहे थे. 

खिलाफत आंदोलन

अंग्रेजों के द्वारा इस युद्ध में भारतीय मुसलमानों का सहयोग लेना भी आवश्यक था. ऐसे में अंग्रेजों ने मुसलमानों के बीच उत्पन्न हुई इस असमंजस की स्थिति को समझ लिया. अतः इंग्लैंड के प्रधानमंत्री लॉर्ड जॉर्ज ने भारतीय मुसलमानों को आश्वासन दिया कि यदि भारतीय मुसलमान इस महायुद्ध में अंग्रेजों का साथ देंगे तो जीतने के बाद वे तुर्की की अखंडता को बनाए रखेंगे और अरब तथा मेसोपोटामिया के इस्लामी धार्मिक स्थलों की रक्षा करेंगे. लाॅर्ड जार्ज के द्वारा इस प्रकार का आश्वासन मिलने पर भारतीय मुसलमानों प्रथम विश्वयुद्ध में अंग्रेजों का साथ दिया. इस विश्वयुद्ध में अंग्रेजों की विजय हुई.

खिलाफत आंदोलन

विश्वयुद्ध के खत्म होने के बाद तुर्की व मित्र राष्ट्रों के बीच 15 मई 1920 ई. को सेवर्स की संधि हुई. इस संधि के द्वारा तुर्की साम्राज्य को छिन्न-भिन्न कर दिया गया. उसके कुछ प्रदेश को स्वतंत्र कर दिया और कुछ भाग पर इंग्लैंड और फ्रांस ने अधिकार कर लिया. तुर्की के सुल्तान की स्थिति एक कैदी के समान हो गई. इंग्लैंड के प्रधानमंत्री के इस विश्वासघात ने भारतीय मुसलमानों को हतप्रभ कर दिया. भारतीय मुसलमानों में जब इस संदर्भ में अंग्रेजों के भारतीय वायसराय से बात की तो उन्होंने कहा कि तुर्की उससे अधिक और किसी व्यवहार की आशा नहीं कर सकता जिसकी आशा जर्मनी के पक्ष में तलवार उठाने वाले अन्य देश कहते हैं. उसे युद्ध में शामिल होने के परिणाम भुगतने ही होंगे. अंग्रेजों के इस विश्वासघात से छूट भारतीय मुसलमानों में अंग्रेजों के विरुद्ध एक आंदोलन चलाया. मुसलमानों के द्वारा चलाए गए इसी आंदोलन को खिलाफत आंदोलन के नाम से जाना जाता है. भारतीय मुसलमानों ने सितंबर 1919 ई. में अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी की स्थापना की. इसी ने खिलाफ़ आंदोलन को जन्म दिया. 

खिलाफत आंदोलन की दो प्रमुख मांग

1. तुर्की के सुल्तान और खलीफा की धार्मिक प्रतिष्ठा और लौकिक प्रतिष्ठा को बनाए रखा जाए. 

2. मुसलमान राष्ट्रों की प्रभुसत्ता की रक्षा का आश्वासन दिया जाए.

खिलाफत आंदोलन

 

खिलाफत आंदोलन कार्यों के उपरोक्त मांग को पूरा करने में अंग्रेजों में कोई रुचि नहीं थी. इस कारण से दिन प्रतिदिन भारतीय मुसलमानों का आक्रोश अंग्रेजो के खिलाफ बढ़ता जा रहा था. 1 अगस्त 1920ई. को गांधीजी ने असहयोग आंदोलन को शुरू किया. इसके बाद खिलाफ़त आंदोलन, असहयोग आंदोलन का एक भाग बन गया. इसी बीच 1922 में चौरी-चौरा की घटना के बाद महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया. इससे खिलाफ़त आंदोलन भी कमजोर पड़ गई. फिर की खिलाफत आंदोलन किसी तरह चलता रहा. इधर तुर्की में युवा तुर्क आंदोलन के कारण कमाल पाशा तुर्की का शासक बन गया. कुछ समय बाद उसने अब्दुल हमीद द्वितीय के भतीजे अब्दुल मजीद को खलीफा बनाया, लेकिन खलीफा पद के लिए तुर्की में बढ़ते विदेशी हस्तक्षेप को देखते हुए कमाल पाशा ने 3 मार्च 1924 को खलीफा पद को हमेशा के लिए खत्म कर दिया. इसके बाद भारत में चल रहे खिलाफ़त आंदोलन स्वतः ही महत्वहीन हो गया.

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