गुप्तकाल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग क्यों कहा जाता है?

भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग (Golden Age of Indian History)

गुप्तकाल (Gupta period) को भारतीय इतिहास में स्वर्ण युग (Golden Age of Indian History) के नाम से जाना जाता है क्योंकि गुप्त शासकों ने अपने शासनकाल में भारत को राजनीति एकता, सुरक्षा और शांति की भावना प्रदान की. गुप्त काल शांति, समृद्धि, धार्मिक पुनरुत्थान बौद्धिक उन्नति, उत्कृष्ट साहित्य तथा कला की उन्नति का काल है. इस काल में भारतीयों ने आत्मविश्वास के साथ-साथ आचार-व्यवहार, मुद्रा, विज्ञान तथा कला के क्षेत्र में भी विदेशों की बहुत सी बातें अंगीकार कर ली थी. परंतु इन बातों को सीखते समय इन बातों का भी ध्यान रखा कि इससे उनकी भारतीयता नष्ट न हो. मूलभूत भारतीयता को पूर्णत: समझा गया, पुष्ट किया गया तथा उसे परिमार्जित एवं चिरस्थायी रूप में व्यक्त किया गया ताकि आगे आने वाली पीढ़ी के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत किया जाए. इस युग में साहित्य, कला और विज्ञान की असाधारण प्रगति हुई तथा बिना किसी रुकावट के इनकी क्रमिक प्रगति हुई है.

गुप्त काल: भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग

गुप्त काल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग कहने का कारण (Reason for calling Gupta period the golden age of Indian history)

1. योग्य सम्राट

गुप्त साम्राज्य की स्थापना 275 ई. के लगभग हुई थी तथा पतन 550 ई. के लगभग हुआ. इस के मध्य गुप्त वंश में एक के बाद एक अत्यंत योग्य, पराक्रमी साम्राज्यवादी तथा दूरदर्शी शासक पैदा हुए. इन शासकों ने अपने कुशल नेतृत्व के द्वारा गुप्त साम्राज्य को स्वर्ण युग बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया. गुप्त शासकों पर संपूर्ण शक्ति होने के बाद भी अपनी ताकत का दुरुपयोग नहीं किया. इतने बड़े साम्राज्य का शासक होकर भी गुप्त उन्होंने कभी स्वेच्छाधारी और निरंकुश बनने का प्रयत्न नहीं किया. गुप्त शासकों ने हमेशा प्रजा के हित के कार्य करने में व्यस्त रहते थे तथा उनका शासन न्यायपूर्ण और कल्याण कल्याणकारी होता था.

गुप्तवंश की शासकों ने अत्यंत दूरदर्शिता एवं नीति कुशलता का परिचय दिया. गुप्त वंश का प्रथम स्वतंत्र शासक चंद्रगुप्त प्रथम था. उसने लिच्छवियों से वैवाहिक संबंध स्थापित कर गुप्त साम्राज्य को दृढ़ता प्रदान की. इसके पश्चात समुद्रगुप्त ने उत्तरी और दक्षिणी भारत के अभियानों के द्वारा गुप्त साम्राज्य की शक्ति को चरम सीमा तक पहुंचाया और अपनी दूरदर्शिता का प्रदर्शन करते हुए जहां उत्तर भारत के सभी राज्यों को अपने राज्य में विलीन कर लिया, वहीं दक्षिण भारत के राजाओं को अपना सामंत बनाया. समुद्रगुप्त के पश्चात चंद्रगुप्त द्वितीय ने न केवल शकों के अस्तित्व को समाप्त किया बल्कि उसने भारत को पूर्ण राजनीतिक एकता भी प्रदान की. कुमारगुप्त और स्कंदगुप्त ने भी पुष्यमित्र एवं हूणों को परास्त कर न केवल भारत की रक्षा की बल्कि भारत की जनता में राष्ट्रीय चेतना की भावना भी जागृत की.

2. विदेशी शासन की समाप्ति

गुप्त शासक साम्राज्यवादी नीति के समर्थक थे. वे संपूर्ण भारत को एक राजनीतिक एकता प्रदान करने की कोशिश कर रहे थे. गुप्त काल के प्रारंभ में अनेक राज्यों पर कुषाणों और शकों की कुछ शाखाएं राज्य कर रहे थे. शक उस समय अत्यंत शक्तिशाली थे. अतः भारत की स्वतंत्रता की रक्षा, राजनीतिक व्यवस्था और एकता स्थापित करने के लिए इनका उन्मूलन करना आवश्यक था. अत: गुप्त शासकों ने इन विदेशी राज्यों पर आक्रमण कर इन्हें परास्त किया और उनके राज्यों को अपने साम्राज्य में मिलाकर हमेशा के लिए भारत से विदेशी सत्ता को उखाड़ फेंका.

गुप्त काल: भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग

3. राजनीतिक एकता की स्थापना

गुप्तों से पहले मौर्य शासकों ने भारत को राजनीतिक एकता प्रदान की थी, किंतु अशोक के निर्बल उत्तराधिकारियों के समय भारत ने इस राजनीति की एकता को खो दिया तथा भारत में जगह-जगह ने स्वतंत्र रूप से विदेशी राज्य एवं स्वदेशी राज्य स्थापित हो गई थी. अतः गुप्तों के उदय से पूर्व लगभग पांच शताब्दी तक भारत खंडित अवस्था में रहा. इसके बाद गुप्तों ने एक बार फिर से भारत को एक अखंड और सफल राष्ट्र के रूप में परिणत कर भारत को राजनीतिक एकता प्रदान की. इस प्रकार गुप्त शासकों ने न केवल भारत को बाहर आक्रमणों का सामना करने योग्य बनाकर भारत की स्वतंत्रता की रक्षा की वर्णन भारतीय सभ्यता और संस्कृति को अक्षुण्ण रखा.

4. कुशल प्रशासनिक व्यवस्था

गुप्त शासकों में अपने साम्राज्य पर कुशल प्रशासनिक व्यवस्था की स्थापना की.  इस कुशल प्रशासन के परिणामस्वरूप जनता आर्थिक रूप से समृद्ध हुई. साम्राज्य में शांति और सुव्यवस्थित वातावरण विकसित हुआ. गुप्तकालीन प्रशासनिक व्यवस्था की पुष्टि जूनागढ़ अभिलेख से भी होती है. इस लेख के अनुसार उस समय साम्राज्य में कोई दुखी, दरिद्र, व्यासनी, कठोर दंड से पीड़ित अथवा राजकीय नियंत्रण से कष्ट युक्त व्यक्ति नहीं था. चीनी यात्री फाह्यान ने भी गुप्तकालीन प्रशासनिक व्यवस्था की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि भारतवर्ष के लोग सुखी और समृद्ध हैं. वे न्यायालय के बंधन से मुक्त है और उन्हें व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्राप्त है. उसने यह भी लिखा है कि गुप्तकाल में कहीं भी चोरी डकैती नहीं होती थी. 

गुप्त काल: भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग

गुप्तों का शासन लोकहित की भावना से प्रेरित था. अलतेकर ने गुप्त शासन व्यवस्था की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि उस समय जनता धनी, समृद्धि एवं धार्मिक थी. सरकार ने जो शक्ति और समृद्धि स्थापित की, वह कला, साहित्य, दर्शन और विज्ञान के साथ-साथ आश्चर्यजनक विकास का कारण बना. इस कुशल प्रशासन के परिणामस्वरुप जनता आर्थिक रूप से समृद्ध हो सकी क्योंकि शांति और सुव्यवस्था का वातावरण एवं वाणिज्य एवं व्यापार का तेजी से विकास हुआ.

5. नैतिकता

गुप्तकालीन शासकों ने प्रजा की नैतिक विकास की ओर पर्याप्त ध्यान दिया. इसके परिणामस्वरुप जनता में नैतिकता और धर्मपरायणता की भावना का विकास हुआ. गुप्तकालीन लोग सदाचारी, शिष्ट, सत्यवादी, सात्विक ईमानदार, उदार और अतिथि सत्कार करने वाले थे. फाह्यान ने भी इसकी प्रशंसा करते हुए लिखा कि लोग प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा आदि का सेवन नहीं करते थे. सिर्फ अस्पृश्य लोग ही इसका सेवन करते थे. जनता में धार्मिक सहिष्णुता की भावना थी और लोग छल-कपट से दूर रहते थे.

6. आर्थिक समृद्धि

गुप्तों के कुशल प्रशासनिक व्यवस्था के कारण गुप्त काल में जनता आर्थिक रूप से समृद्ध हुई. गुप्तकालीन शासकों ने प्रशासनिक कार्यों के अंतर्गत कृषि के विकास की ओर अत्यधिक ध्यान दिया क्योंकि इस काल में भारत एक कृषि प्रधान देश था. गुप्तों ने सिंचाई का उचित प्रबंध किया. इसके अतिरिक्त स्थिर शासन व्यवस्था, प्रशासन की कार्यकुशलता और गुप्त शासकों के प्रोत्साहन के परिणामस्वरुप गुप्त काल में वाणिज्य और में व्यापार में तेजी से विकास हुआ. इस युग में भारत के अनेक देशों से व्यापारिक संबंध स्थापित हुए. इससे विदेशों से सोना भारत आने लगा. डॉ. आर. एस. मुखर्जी ने भी गुप्तकालीन इस भौतिक तथा नैतिक उन्नति का श्रेय गुप्तों के द्वारा स्थिरता स्थापित करने को ही दिया है. डॉ. त्रिपाठी ने इस आर्थिक समृद्धि का कारण देशी और विदेशी व्यापार को गुप्त शासकों के द्वारा कृषि और व्यापार को अत्यधिक प्रोत्साहन देना बताया. इस प्रकार गुप्त शासकों के द्वारा सिंचाई और व्यापार को प्रोत्साहित देने के परिणामस्वरुप गुप्तकालीन जनता आर्थिक रूप से संपन्न और समृद्ध हुई.

7. कला का विकास

गुप्त काल में कला का सर्वांगीण विकास हुआ. वास्तुकला, मूर्तिकला, चित्रकला और मूर्तिकला आदि कला ने इस काल में ऐसी परिपक्वता, संतुलनता और अभिव्यक्ति की नैसर्गिकता प्राप्त की जहां कोई न पहुंच सका. गुप्तकाल में कला केवल राजमहलों तक ही सीमित नहीं रही, वरन कला के साथ लौकिक जीवन के मध्य घनिष्ठ संबंध स्थापित हुआ. इस विषय में शचिरानी गुर्टू ने लिखा है कि गुप्त राजाओं के समय शिल्प एवं कला चरम तक पहुंच गई थी.

गुप्त काल: भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग

गुप्तकाल कालीन वास्तुकला की प्रमुख उपलब्धि मंदिरों का निर्माण किया जाना है तथा कुछ मंदिर में शिखर का भी होना है. इस युग के प्रसिद्ध मंदिरों में मुख्य रूप से भूमरा का शिव मंदिर, तिगवा का विष्णु मंदिर, नचना कुठारा का पर्वती मंदिर, देवगढ़ तथा दशावतार मंदिर आदि हैं. मूर्तिकला ने भी गुप्त काल में असाधारण प्रगति की. इस काल में बौद्ध, वैष्णव, शिव, जैन आदि की अनेक मूर्तियों का निर्माण किया गया. गुप्तकालीन चित्रकला के उदाहरण अजंता और बाघ की गुफाओं को देखने से मिलते हैं. श्रीमती ग्रैबोस्का ने गुप्तकालीन चित्र की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि अजंता की कला भारत की सर्वश्रेष्ठ कला है. चित्रों की सुंदरता अलौकिक है और ये चित्र भारतीय चित्रकला के उत्कृष्ट नमूने हैं. इस युग में धातुकला की भी उन्नति हुई. महरौली का लौह स्तंभ और महात्मा बुद्ध की कांस्य प्रतिमा इसके उदाहरण हैं. गुप्त काल में सुंदर और बारीक कटाई वाले मुद्राओं का भी निर्माण हुआ.

8. वृहत्तर भारत की स्थापना

गुप्त काल में भारतीयों का अनेक देशों से संपर्क स्थापित हुआ. धर्म के प्रचार एवं व्यापारिक कारणों के कारण अनेक भारतीय बाली, जावा, सुमित्रा, मलाया  बोर्नियां, चम्पा, कंबोडिया आदि देश पहुंचे और यहां उन्होंने अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए उपनिवेशों की स्थापित की और वृहत्तर भारत की स्थापना की. भारतीय धर्म और संस्कृति ने इन देशों को अत्याधिक प्रभावित किया. इस विषय पर बार्नेट ने लिखा है यह युग सुदूर पूर्व में भारतीय संस्कृति के प्रचार का युग था जिसके कारण वृहत्तर भारत का जन्म हुआ.

गुप्त काल: भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग

9. हिंदू धर्म का पुनरुत्थान और धार्मिक सहिष्णुता

मौर्य सम्राटों द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण करने के पश्चात तथा गुप्त शासकों के उदय से पूर्व के काल तक हिंदू धर्म का निरंतर पतन होता जा रहा था. किंतु प्रारंभिक गुप्त शासकों के वैष्णव धर्मावलम्बी होने के कारण इस युग में हिंदू धर्म का पुनरुत्थान होना शुरु हुआ. गुप्त शासकों ने पाली के स्थान पर संस्कृत को राष्ट्रीय भाषा घोषित किया तथा वैदिक कर्मकांड और अश्वमेध यज्ञ का आयोजन करके हिंदू धर्म को पुनः सशक्त बनाया. गुप्त काल में अनेक हिंदू मंदिरों का निर्माण हुआ था जिससे हिंदू धर्म के प्रति लोगों की निष्ठा बढ़ी. इस प्रकार गुप्त सम्राटों के संरक्षण प्राप्त कर हिंदू धर्म, बौद्ध और जैन धर्म को पीछे धकेल कर पुनः अपना गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त कर राष्ट्र का प्रमुख धर्म बन गया.

यद्यपि गुप्त सम्राट वैष्णव धर्मावलम्बी रहे, किंतु उन्होंने धार्मिक सहिष्णुता की नीति का पालन करते हुए सभी धर्म को स्वतंत्रता प्रदान की थी. राज्य की ओर से धर्म के आधार पर प्रजा से भेदभाव नहीं किया जाता था. इसी कारण उन्होंने वैष्णव होते हुए भी राजकीय पदों को सभी धर्म के लोगों के लिए उन्मुक्त रखे थे.

इन्हें भी पढ़ें:

Note:- इतिहास से सम्बंधित प्रश्नों के उत्तर नहीं मिल रहे हैं तो कृपया कमेंट बॉक्स में कमेंट करें. आपके प्रश्नों के उत्तर यथासंभव उपलब्ध कराने की कोशिश की जाएगी.

अगर आपको हमारे वेबसाइट से कोई फायदा पहुँच रहा हो तो कृपया कमेंट और अपने दोस्तों को शेयर करके हमारा हौसला बढ़ाएं ताकि हम और अधिक आपके लिए काम कर सकें.  

धन्यवाद.

2 thoughts on “गुप्तकाल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग क्यों कहा जाता है?”

  1. Sir mujhe class 12th ki history ke imp questions and answers chahiye sir अर्धवार्षिक परीक्षा के लिए 2023-24

    Reply

Leave a Comment

Telegram
WhatsApp
FbMessenger
error: Please don\'t copy the content.