नादिरशाह के आक्रमण के कारण, घटनाओं और परिणामों पर प्रकाश डालिए

नादिरशाह का अभियान (INVASION OF NADIRSHAH)

नादिरशाह का जन्म 1688 ई. में खुरासान के एक तुर्कमान वंश में हुआ था. वह फारस के शासक सफवी राजा शाह तहमास्प का प्रधान सेनापति था. उसने अपने योग्यता एवं प्रतिभा से फारस के शासक को अत्यंत प्रभावित किया था. उसने अफगानों के आक्रमण से फारस की रक्षा की. अफगानों ने फारस के अधीन आनेवाले क्षेत्र कंधार पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था. नादिरशाह ने उसे अफगानों से आजाद करवाया. इसके अलावा अफगानों ने 1722 ई. में फारस की राजधानी इसफहान पर अधिकार कर लिया था. नादिरशाह ने इसे भी अफगानों से आजाद करवा लिया. इस प्रकार उसने धीरे-धीरे सम्पूर्ण फारस को अफगानों से खाली करा लिया. उसकी वीरता से प्रसन्न होकर फारस के शासक ने नादिरशाह को आधे फारस का स्वतंत्र शासक बना दिया. इससे नादिरशाह की महत्वकांशा और ही बढ़ गया. यही कारण जैसे ही 1736 ई. में सफ़वी वंश के अंतिम सम्राट की मृत्यु हुई तो उसने समस्त पारस पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया और सम्पूर्ण फारस का शासक बन बैठ. फारस  का शासक बनते ही उसने साम्राज्य विस्तार करना आरम्भ किया. अपने इस नीति के तहत उसने 1738 ई. में उसने भारत पर आक्रमण किया.

नादिरशाह के आक्रमण

नादिरशाह के भारत पर आक्रामक के कारण

1. धन की आवश्यकता

नादिरशाह के लिए कंधार को जीतना अत्यंत आवश्यक था क्योंकि कंधार कभी भी उसके साम्राज्य की शांति पर खतरा उत्पन्न कर सकता था. दूसरा बिना कंधार पर अधिकार किया वह सफ़वी वंश के पूर्ण  उत्तराधिकारी भी बन नहीं सकता था. वह तुर्कों के विरुद्ध भी संघर्ष जारी रखना चाहता था. अत: इसके लिए उसे पर्याप्त धन की आवश्यकता थी. प्रोफेसर सतीश चंद्र के अनुसार तुर्कों के विरुद्ध जारी रखने के लिए आवश्यक धन भारत पर आक्रमण करके प्राप्त किया जा सकता था. क्योंकि उस समय भारत सोने-चांदी और हीरे जवाहरात एवं अतुल धनराशि के लिए काफी ख्याति प्राप्त का रखा था. इस प्रकार नादिर शाह के भारत पर आक्रमण करने के प्रमुख कारण उसकी राजनीतिक एवं आर्थिक स्थिति थी. 

2. असुरक्षित सीमाएं

नादिरशाह का भारत पर आक्रमण करना कोई अप्रत्याशित घटना नहीं थी. दरअसल इस घटना के पृष्ठभूमि तो औरंगजेब के शासनकाल में ही तैयार हो चुकी थी किंतु औरंगजेब ने उत्तर-पश्चिमी सीमाओं की सुरक्षा एवं प्रशासन पर विशेष ध्यान दिया था. इस कारण किसी ने आक्रमण करने की हिम्मत नहीं की, किंतु औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात मुगल साम्राज्य के अयोग्य उत्तराधिकारियों की नीतियों ने उत्तर-पश्चिम में सीमा प्रांत के निवासियों में रोष उत्पन्न कर दिया. उत्तर-पश्चिमी सीमा के प्रांत निवासियों का असंतोष नादिरशाह के लिए अत्यंत लाभप्रद हो सकता था. गुलाम हुसैन के अनुसार उत्तर-पश्चिमी सीमा पर नियुक्त सेना पूर्णत: उपेक्षित थी. जनजातियों को दिया जाने वाला धन अधिकारी या आश्रित वर्ग हड़प जाते थे. धन के अभाव में सेना अव्यस्थित हो गई और कबाइली मुगल साम्राज्य से नाराज हो गए. औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात मुगल साम्राज्य के अयोग्य उत्तराधिकारियों की नीतियों ने उत्तर-पश्चिम में सीमा प्रांत के निवासियों में रोष उत्पन्न कर दिया. गुलाम हुसैन के अनुसार उत्तर-पश्चिमी सीमा पर नियुक्त सेना पूर्णत: उपेक्षित थी. जनजातियों को दिया जाने वाला धन अधिकारी या आश्रित वर्ग हड़प जाते थे. धन के अभाव में सेना अव्यस्थित हो गई और कबाइली मुगल साम्राज्य से नाराज हो गए.

नादिरशाह के आक्रमण

3. मुग़ल साम्राज्य की दुर्बलता

डॉ. सतीश चंद्र के अनुसार नादिरशाह के सम्मुख तैमूर एवं बाबर का भी उदाहरण था और मुगल दरबार की कमजोरी किसी से छिपी नहीं थी. अतः भारत विजय प्राप्त करना कठिन कार्य नहीं था. इस स्थिति ने नादिरशाह को भारत पर आक्रमण करने को प्रेरित हुआ.

4. आक्रमण के लिए आमंत्रण

रुस्तम अली के अनुसार निजाम-मूल-मुल्क और बुरहानुल मुल्क ने जो मुगल दल के प्रधान थे, वे ईरानी बादशाह को नवीन साम्राज्य की नीव के लिए आमंत्रित किया था क्योंकि मुगलों कमजोर स्थिति के कारण भोंसले और मराठों की सत्ता स्थापित होने का खतरा उन्हें हो गया था. बाजीराव एवं भौंसले ने अपने लगाकर अभियानों से दिल्ली, बंगाल एवं अयोध्या तक की सीमा को आतंकित कर दिया था. भारत पर आक्रमण करने से पहले नादिर शाह ने घोषणा की कि उसका उदेश्य मराठों से मुग़ल साम्राज्य कि सुरक्षा करना है. दरसल इस घोषणा का उद्देश्य मुगल अमीरों एवं वजीरों का समर्थन प्राप्त करने का था.

नादिरशाह को अपने उन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए भारत पर आक्रमण करने का बहाना भी मिल गया. उसने 1730 ई. में मुगल सम्राट मोहम्मद शाह को पत्र लिखा कि कंधार के अफगान शासकों को काबुल में शरण न दी जाए. मुगल सम्राट ने नादिरशाह को पूर्ण आस्वस्त कर दिया, लेकिन जब 1737 ई. में नादिरशाह ने जब कंधार पर आक्रमण किया तो अफगानों ने गजनी एवं काबुल में शरण ली. इस कारण नादिरशाह ने अपने दूत मुगल सम्राट के पास भेजे और उसने मांग की कि अफगानों को शरण न दी जाए तथा हरजाने के रूप में नादिरशाह को एक करोड़ रूपया दिया जाए. इसपर नादिर शाह के दूत एवं उनके साथियों के साथ अत्यंत दुर्व्यवहार किया गया और मुगल सैनिकों ने जलालाबाद में दूत की हत्या भी कर दी. नादिरशाह इस कारण अत्यंत रुष्ट हुआ उसने लगभग 1 वर्ष तक उत्तर की प्रतीक्षा की और किसी प्रकार के उत्तर न पाने पर युद्ध की तैयारी शुरू कर दी. 

नादिरशाह के आक्रमण

यदि अगर आक्रमण के लिए आमंत्रण की बात का  परीक्षण किया जाए तो हम पाते है कि इस आमंत्रण का उल्लेख नादिरशाह के पत्रों में नहीं मिलता रुस्तम अली कथन का कथन था कि यदि नादिरशाह को निमंत्रण न भी मिलता तो वह अपनी राजनीतिक एवं आर्थिक जरूरतों कि पूर्ति करने के लिए उनका भारत पर आक्रमण निश्चित था.

घटनाएं

11 जून 1738 ई. को नादिरशाह ने गजनी पर आक्रमण करके उसको जीत लिया और उसने 29 जून को काबुल पर भी अधिकार कर लिया. काबुल के शासक नासिर खां नादिरशाह के सम्मुख घुटने टेक दिए. इसके बाद लाहौर पर भी अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया. अब नासिर खां और लाहौर के गवर्नर का समर्पण समर्थन हासिल कर दिशा दिल्ली की ओर प्रस्थान किया. मुगल सम्राट 8000 सैनिकों के साथ नादिरशाह से लोहा लेने के लिए दिल्ली से निकल पड़ा. दोनों सेनाओं के बीच 24 फरवरी 1739 ई. को करनाल नामक स्थान पर भीषण युद्ध हुआ. यह युद्ध इतिहास में करनाल की युद्ध के नाम से जाना जाता है. यह युद्ध मात्र 3 घंटे चला और इस युद्ध में मुग़ल शासक मुहम्मद शाह पराजित हुआ. खान की युद्ध भूमि में ही मृत्यु हो गई. सआदत खां को बंदी बना लिया गया. निजाम-उल-मुल्क ने नादिरशाह से मित्रता कर ली. 20 मार्च 1739 ई. को नादिरशाह दिल्ली पहुंचा और अपने नाम का खुतवा पढ़वाया और अपने नाम के सिक्के जारी करवाई. इस प्रकार दिल्ली में मुगल सत्ता के स्थान पर फारसी सत्ता स्थापित हुई. नादिरशाह लगभग 2 महीने तक दिल्ली में रहा और उसके बाद उसने पुन: मुहम्मद शाह को मुगल सम्राट घोषित किया और 5 मई 1739 ई. को दिल्ली से प्रस्थान किया. नादिर शाह ने अपने पुत्र नासीरुल्लाह मिर्जा की शादी मुगल सम्राट की पुत्री का विवाह नादिरशाह के पुत्र नसी बिरला मिर्जा से हुआ.

नादिरशाह के आक्रमण के परिणाम

1. आर्थिक क्षति

नादिरशाह के आक्रमण का सबसे गंभीर परिणाम आर्थिक क्षेत्र में पड़ा. नादिरशाह ने अपने साथ लगभग 30 करोड़ रूपया नकद, सोने-चांदी, हीरे जवाहरात, 100 हाथी, 7000 घोड़े, 10000 ऊंट, राज मिस्त्री, लोहार और बढ़ई को भी अपने साथ ले गया. पंजाब के गवर्नर ने उसे 20 लाख रुपया प्रतिवर्ष देना स्वीकार किया. थट्टा का उपयोगी प्रांत एवं बंदरगाहें भी उसे प्राप्त हुए. डॉ. सतीश चंद्र के अनुसार स्वयं मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह को कोहिनूर हीरा एवं अन्य राजसी हीरे जवाहर रात देने पड़े. वह मयूर सिहांसन को भी अपने साथ ले गया. नादिरशाह के द्वारा की गई इस लूट खसोट ने भारतीय व्यापार एवं वाणिज्य पर गंभीर प्रभाव डाला. मुगलों की पीढ़ियों से संचित खजाना खाली हो गया. जर्जरित आर्थिक स्थिति ने सामंतो में जगीरो के लिए संघर्ष को बढ़ा दिया.

2. जगीरों के लिए संघर्ष में वृद्धि

दयनीय आर्थिक स्थिति ने धन के अभाव को स्पष्ट कर दिया. धन की पूर्ति के लिए कृषकों से अधिक से अधिक कर वसूलने की नीति अपनाएं जाने लगे. इस वसूली ने सैन्य अभियान का रूप धारण कर लिया. अतः वसूली के इस अभियान ने एक संघर्ष को जन्म दिया. यह संघर्ष जगीरो की प्राप्ति के लिए संघर्ष था. कालांतर में यह संघर्ष विजारत के लिए संघर्ष के रूप में सामने आया.

नादिरशाह के आक्रमण

3. उत्तर-पश्चिमी सीमा का असुरक्षित होना

नादिरशाह के आक्रमण के कारण भारत के उत्तर पश्चिमी-सीमा असुरक्षित हो गए. सिंधु नदी के चार प्रदेश भारत के हाथ से निकल गए. आने वाले वर्षों में उत्तर-पश्चिम से अनेक आक्रमण इसी कारण हुआ.

4. सांस्कृतिक पतन

नादिरशाह के आक्रमण का प्रभाव भारत के सांस्कृतिक क्षेत्र पर भी पड़ा. भारत में नादिरशाह के दो माह के शासन के दौरान लूटपाट और कत्लेआम का जो दौर चला, उस से देश में अराजकता की स्थिति बन गई. ईरान और भारत के मध्य सांस्कृतिक संबंधों में दरार पड़ गए. डॉ. सतीश चंद्र के अनुसार हो सकता है कि यातायात की सुविधाएं कम होने के कारण भारत के थल मार्ग से विदेशी व्यापार में कमी हो गई हो.

5. सामरिक प्रभाव

नादिरशाह के आक्रमण का भारत पर सामरिक प्रभाव भी पड़ा. नादिरशाह ने अपने भारत अभियान में हल्की तोपें, जजायत एवं रहकला एवं शीघ्र चलने वाली बंदूकों का प्रयोग किया. इन सामरिक शास्त्रों की ओर यदि पर मराठों ने विशेष ध्यान नहीं दिया, किंतु रुहेलों ने इस ओर विशेष ध्यान दिया. कालांतर में रुहेलों ने मराठों का सामना करने के लिए इन सामरिक शास्त्र का प्रयोग किया. नि:संदेह पानीपत के तृतीय युद्ध में मराठों की पराजय का यह महत्वपूर्ण कारण था.

6. मुगल साम्राज्य का पतन

नादिरशाह के आक्रमण का मुगल साम्राज्य के पतन में कितना उत्तरदायित्व था, इस संदर्भ में इतिहासकारों में मतभेद है. मुग़ल साम्राज्य के पतन के लिए नादिरशाह के आक्रमण का उत्तरदायित्व का दावा करने वाले विद्वानों का तर्क है कि इस आक्रमण से साम्राज्य की शक्ति के खोखलापन स्पष्ट हो गया. सुदूर स्थित राज्यपालों ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी. सिंधु नदी के पश्चिमी क्षेत्र मुगल साम्राज्य से अलग हो गए. कबूल एवं अफगानिस्तान भी मुगल साम्राज्य से निकल गया.

नादिरशाह के आक्रमण

किंतु दूसरी और डॉ. सतीश चंद्र का मानना है कि मुगल साम्राज्य के पतन के लिए नादिरशाह के आक्रमण को प्रमुख कारण नहीं माना जा सकता है. उसके के अनुसार यह कहना कि इसके बाद सूबेदार स्वतंत्र हो गए तथा मुगल साम्राज्य के वास्तविक कमजोरी का रहस्य मराठों को मालूम हो गया, ऐतिहासिक तथ्य नहीं है. मराठों ने तो मुगल साम्राज्य की कमजोरी को पहले ही पकड़ ली थी. निजाम और बंगाल के सूबेदार जिस प्रकार शासन चला रहे थे, उस से तो लगता था कि उस पर आक्रमण का कोई प्रभाव नहीं पड़ा. इस प्रकार मुगल साम्राज्य के पतन के लिए नादिरशाह के आक्रमण को प्रमुख कारण नहीं माना जा सकता, किंतु इतना स्वीकार करना होगा कि इस आक्रमण का व्यापक प्रभाव मुग़ल साम्राज्य पर पड़ा.

7. यूरोपीय व्यापारियों की भारत में रुचि बढ़ जाना

नादिरशाह के आक्रमण का एक महत्वपूर्ण परिणाम यह निकला है कि अब मुगल साम्राज्य के कमजोरियों से से अवगत होकर यूरोपीय व्यापारियों ने भारतीय राजनीति में रुचि लेना आरंभ कर दिया. इस प्रकार एक नया युग का बीजारोपण हो गया. इसके परिणामस्वरूप वेलेजली के द्वारा मराठों की पराजय हुई. 

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