भारतीय रियासतों के भारत में विलय में क्या समस्याएं थी? सरदार पटेल ने इनका विलय कैसे किया?

भारतीय रियासतों के भारत में विलय

भारत के स्वतंत्र होने के बाद आजाद भारत में कुल 562 रियासतें थी. 1858 ई. से जिन राज्यों की अंग्रेजी सरकार से संबंध थे उन्हें सर्वोच्चता कहा जाता था. सैद्धांतिक दृष्टिकोण से भले ही ये रियासतें आंतरिक मामलों में स्वतंत्रता थी, किंतु वास्तविक रूप से उन पर अंग्रेजी शासन का नियंत्रण था. 1946 ई. में कैबिनेट मिशन योजना के अंतर्गत यह घोषणा की गई कि आजादी के बाद सर्वोच्चता समाप्त कर दी जाएगी और यह अधिकार भारतीय सरकार को नहीं दिया जाएगा. इस घोषणा के बाद सभी रियासतें पूर्ण स्वतंत्र होने की स्वप्न देखने लगी. इस प्रकार अंग्रेजों ने भारतीयों के लिए अत्यंत जटिल समस्या उत्पन्न कर दी. 5 जुलाई 1947 ई. को सरदार पटेल के अध्यक्षता में स्टेट विभाग की स्थापना की गई. सरदार पटेल ने देखा कि 562 राज्यों में से लगभग 100 राज्य प्रमुख थे जो आकार में बड़े थे. जैसे- हैदराबाद, कश्मीर, बडौदा, ग्वालियर, मैसूर आदि. इसके विपरीत कुछ रियासतें बहुत सी छोटी थी. इन राज्यों में निरंकुश राजतंत्र व्यवस्था लागू थी तथा इन रियासतों के शासक दैवीय अधिकारों में विश्वास रखते थे. सरदार पटेल के कठिन प्रयत्नों से पाकिस्तान में शामिल होने वाले रियासतों के अतिरिक्त से लगभग रियासतें भारत में शामिल हो गए. केवल जूनागढ़, कश्मीर और हैदराबाद की रियासतें इस विलय के लिए तैयार नहीं थी.

भारतीय रियासतों के भारत में विलय

इन सभी रियासतों का भारत में विलय करना सरल कार्य नहीं था. किंतु सरदार पटेल ने अपनी असाधारण योग्यता का परिचय दिया और उन्होंने रियासतों से अपील की कि भारत की अखंडता को बनाए रखने के लिए वे उनकी सहायता करें. उन्होंने उनकी ओर मैत्री और सद्भावना का हाथ बढ़ाया और भारत में सम्मिलित हो जाने के लिए कहा. सरदार पटेल ने रियासतों को भारत में विलय करने के लिए दो प्रकार की पद्धतियों को प्रोत्साहन किया- बाह्य विलय और आंतरिक संगठन. बाह्य विलय में छोटे-छोटे राज्यों को मिलाकर अथवा पड़ोसी रियासत को मिलाकर एक बड़ा राज्य बनाना तथा आंतरिक संगठन के आधार पर इन राज्यों में प्रजातांत्रिक प्रणाली को लागू करना. उनके इस तरह के प्रयासों से दिसंबर 1947 ई. में उड़ीसा और छत्तीसगढ़ के 39 राज्यों का उड़ीसा तथा क में विलय हुआ. इसी तरह फरवरी 1948 ई. में मुंबई प्रदेश के साथ 17 दक्षिणी राज्यों का विलय हुआ. जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर की रियासतों का भारत में विलय करने के लिए सरदार पटेल को सेना की सहायता लेनी पड़ी. जूनागढ़ एक छोटी रियासत थी. इस प्रकार रियासतों की उल्लेखनीय विशेषता यह थी कि इसका नवाब मुसलमान तथा प्रमुख जनता हिंदू थी. जूनागढ़ के नवाब ने पाकिस्तान में सम्मिलित होने का निर्णय किया जिसका वहां की जनता ने विरोध किया. जनता की सहायता के लिए सरदार पटेल ने सेना भेजी. भारतीय सेना के जूनागढ़ पहुंचने पर जूनागढ़ का नवाब पाकिस्तान भाग गया. जूनागढ़ में 1948 ई. को जन्म संग्रह कराया गया जो कि भारत के पक्ष में गया. इस प्रकार जूनागढ़ का भारत में विलय हो गया.

भारतीय रियासतों के भारत में विलय

हैदराबाद की निजाम भी भारत में सम्मिलित होने के पक्ष में नहीं था. दूसरी ओर हैदराबाद की जनता भारत में मिलना चाहती थी. अत: उन्होंने निजाम के विरुद्ध विरोध-प्रदर्शन करना आरंभ कर दिया. इस पर निजाम ने हिंदुओं पर भयंकर अत्याचार करना आरंभ कर दिया. कासिम रिजवी के नेतृत्व में नवाब ने विरोध करने वाली जनता पर भीषण अत्याचार और लूटपाट करना आरंभ कर दिया. इससे सारे रियासत में आतंक फैल गया. अंततः जनता की रक्षा के लिए सरदार पटेल को 13 सितंबर 1948 ई. को भारतीय सेना हैदराबाद भेजनी पड़ी. भारतीय सेना की कार्रवाई के कारण हैदराबाद के निजाम को अंतत: भारत में शामिल होने के लिए विवश होना पड़ा.

भारतीय रियासतों के भारत में विलय

जूनागढ़ और हैदराबाद की समस्या से अधिक कहीं अधिक जटिल समस्या कश्मीर को भारत में विलय करने की थी. कश्मीर का शासक हिंदु था लेकिन मुसलमान जनता बहुसंख्यक थी तथा इसकी सीमा पाकिस्तान से भी मिलती थी. अतः जिन्ना भी कश्मीर को पाकिस्तान में मिलना चाहते थे. कश्मीर के शासक ने भी स्पष्ट रूप से घोषणा नहीं की कि वह पाकिस्तान या भारत किस में मिलना चाहते हैं. इस बात का लाभ उठाते हुए जिन्ना ने 22 अक्टूबर 1947 ई. को कबाइली लुटेरों के वेश में पाकिस्तान सेना को कश्मीर पर अधिकार करने भेजा. इस पर कश्मीर का शासक भयभीत हो गया और उसने भारत से सैन्य सहायता मांगी. सरदार पटेल भी इसी अवसर की तलाश में थे. उन्होंने कहा कि भारत कश्मीर की रक्षा करेगा किंतु शर्त ये है कि भविष्य में कश्मीर के विलय का निर्णय जनमत संग्रह से किया जाएगा. इस शर्त को स्वीकार करने के बाद पटेल नहीं भारतीय सेना कश्मीर भेजी. भारतीय सेना ने कबाइली लुटेरों को मार भगाया.  31 दिसंबर 1947 ई. को भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ से अपील की कि वह पाकिस्तान को उत्तर-पश्चिम से आनेवाले लुटेरों को भारत पर आक्रमण करने से रोक. 11 जनवरी 1949 ई. को भारत-पाकिस्तान के मध्य युद्ध विराम संधि हुई. संयुक्त राष्ट्र संघ इस मामले में कुछ नहीं कर सका. इस प्रकार सभी रियासतों का भारत में विलय करने में सरदार पटेल सफल रहे. यह उनकी असाधारण उपलब्ध थी जिसने भारतीय अखंडता की रक्षा की.

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