मुग़ल साम्राज्य के पतन के कारणों का वर्णन करें

मुग़ल साम्राज्य के पतन के कारण

1. औरंगजेब का व्यक्तित्व

मुगल साम्राज्य का अधिकतम विस्तार औरंगजेब के काल में हुआ था, परंतु मुगल साम्राज्य की सीमाओं की हालत ऐसी हो गई थी कि पूरे साम्राज्य पर नियंत्रण बनाए रखना असंभव था. संचार के साधन इतने कम थे कि पूरे साम्राज्य को अपने नियंत्रण में रखना औरंगजेब की बस की बात नहीं रही. सही मायने में वह एक राजा और राजनीतिज्ञ के रूप में असफल रहा. अकबर अपने समय में योग्य उच्च पदों पर व्यक्तियों की नियुक्ति करता था, लेकिन औरंगजेब ने इन सिद्धांतों को त्याग दिया और अयोग्य लोगों को ऊँचे पदों पर जगह देना शुरू कर दिया. इस कारण साम्राज्य की व्यवस्था बिगड़ती चली गई और जनता में असंतोष उत्पन्न होती चली गई. इस कारण सिख, जाट, बुन्देल, राजपूत और मराठे मुगलों के खिलाफ विद्रोह करना शुरू कर दिए.

मुग़ल साम्राज्य के पतन के कारण

सम्राट औरंगजेब की इस धर्मांध नीति के कारण मुगलों के सबसे बड़े समर्थक राजपूत भी उसके शत्रु बन गए. जजिया कर पुन: लागू करने तथा अन्य सामाजिक अपमानों के कारण सतनामी, बुंदेल और जाटों में भी विद्रोह कर दिए. पंजाब में सिखों ने विद्रोह किया और लगभग शासन लगभग ठप सा हो गया. मराठों का विद्रोह तो राष्ट्रव्यापी ही बन गया और सब लोग धर्म और स्वतंत्रता के लिए इस संघर्ष में सम्मिलित हुए. मराठों के गोरिल्ला युद्ध ने औरंगजेब की सेना का मनोबल ह्रास कर दिया और धीरे-धीरे वह निष्क्रिय होती चली गई.

औरंगजेब अपनी साम्राज्यवादी और महत्वाकांक्षी नीति के कारण दक्षिण के बीजापुर और गोलकुंडा के राज्य को हड़पना चाहता था. ये दोनों शिया मुस्लिमों का राज्य था, जबकि औरंगजेब सुन्नी मुसलमान था. इन दोनों मुस्लिम राज्यों के समाप्त होने से दक्षिण में मराठों पर सबसे महत्वपूर्ण स्थानीय नियंत्रण समाप्त हो गया और वे मुगल साम्राज्य के विरुद्ध अपने आप को संगठित करने जुट गए. दक्षिण की इस मूर्खतापूर्ण नीति लगभग 25 वषों तक चलती रही जिस कारण राज्य के समस्त संसाधनों पर इतना बोझ पड़ा. इससे मुग़ल साम्राज्य के धन और सेना आदि का अत्यधिक नुकसान उठाना पड़ा.

मुग़ल साम्राज्य के पतन के कारण

2. औरंगजेब के निशक्त उत्तराधिकारी

औरंगजेब के बाद के सभी मुगल सम्राट काफी दुर्बल और अयोग्य थे. इस कारण और साम्राज्य की आंतरिक तथा बाहरी परिस्थितियों को संभाल नहीं सके. मुग़ल सम्राटों के नैतिक पतन और अयोग्यता के कारण राज्य का व्यवस्था संभलने के स्थान पर और बिगड़ते चले गए. सिंहासन पर बैठने के समय बहादुर शाह (1707-12) की आयु 63 वर्ष की थी और वह साम्राज्य के प्रतिष्ठा बनाए रखने में असमर्थ था. वह सभी दलों को प्रसन्न रखने की कोशिश में लगा रहा और सरदारों को बड़ी-बड़ी उपाधियां बांटता रहा. उसके बाद जहाँदारशाह (1712-13), फर्रुखसियार (1713-19) और मुहम्मद शाह (1719-48) जैसे एक के बाद एक अयोग्य शासक हुए. मुहम्मद शाह अपना अधिकतर समय पशु युद्ध को देखने में व्यतीत करता रहा. उसकी प्रशासनिक उदासीनता और मंदिरा और औरतों के प्रति रुचि होने के कारण लोग उसे रंगीला कहा करते थे. इसके बाद अहमद शाह (1748-54) ने तो अपने पूर्वजों को भी मात दे दिया. उसका हरम तो एक वर्ग कोस में फैला हुआ था. वहाँ पुरुषों को आने के अनुमति तक नहीं थी. कई बार तो वह एक सप्ताह भर अथवा एक-एक महीने तक स्त्रियों के पास पड़ा रहता था. 1753 ई में उसने अपने 2.5 वर्षीय पुत्र को पंजाब का सूबेदार नियुक्त कर दिया और एक वर्ष से बालक मुहम्मद अमीन को उसका नायब सूबेदार नियुक्त कर दिया. इसी प्रकार उसने कश्मीर की सूबेदारी का एक वर्षीय बालक तला सैयद शाह को दे दी और 15 वर्षीय एक लड़का को उसका नायब नियुक्त कर दिया. ये नियुक्तियां भी उस समय की गई जब अफगानों के आक्रमणों का भय था. इस प्रकार शक्तिहीन और मूर्ख सम्राट राज्य के हितों की रक्षा नहीं कर सकते थे.

मुग़ल साम्राज्य के पतन के कारण

3. मुगल अभिजात वर्ग का पतन

सम्राटों की अय्याशी भरी जीवन को देखकर अभिजात वर्ग मेहनत करना और कठोर सैनिक जीवन छोड़ दिए. वे भी वीर योद्धाओं की तरह जीवन बिताने के स्थान पर रसिक प्रियतम बन गए. किसके हरम में कितनी अधिक स्त्रियां है इसकी होड़ लगी रहती थी. वे अपना जीवन जुए और शराब में व्यतीत करने लगे. बैरम खां, मुजफ्फर खां, अब्दुल रहीम, महबत खां, आसिफ खान, सैयद उल्ला खां जैसे वीर योद्धा अब खोजे नहीं मिलते. उत्तर कालीन मुगलों का अभिजात वर्ग बेईमानी, झूठ, मक्कारी चापलूसी यदि में एक-दूसरे से बढ़कर था. जब सम्राटों ने योग्यता के आधार पर पदोन्नति करने के स्थान पर चापलूसी को बढ़ावा दिया तो वीरता और योग्यता समाप्त हो गए. इस कारण अब मुग़ल साम्राज्य में योग्य शासक और वीर सैनिक ख़त्म होते चले गए.

4. दरबार में गुटबाजी 

औरंगजेब के अंतिम दिनों में दरबार में गुटबाजी होना शुरू हो गया. इस कारण दरबारी अलग अलग गुटों और दलों में बंट गए. इन गुटों ने साम्राज्य में राजनीतिक अशांति की स्थिति उत्पन्न कर दी. मुहम्मद शाह के सजसनकाल अशफ जहाँ निजामुलमुल्क, कमरुद्दीन, जकरिया खां इत्यादि तुरानी दल के नेता थे. आमिर खां, इसहाक खां और सआदत खां फारसी दल के नेता थे. दोनों दल मिलकर हिंदुस्तानी दल के विरुद्ध थे. इस हिंदुस्तानी दल के नेता सैयद बंधु थे और इन्हें हिंदुओं का भी समर्थन प्राप्त था. प्रत्येक गुट का प्रयत्न होता था कि वे दूसरे गुट के विरुद्ध सम्राट के कान भरे और सम्राट को दूसरे दल के विरुद्ध कर दे. ये दल आपस में छोटे-छोटे युद्ध भी लड़ते थे. विदेशी आक्रमण के विरुद्ध भी ये दल एक नहीं हो सकते थे और प्राय: आक्रांताओं से मिलकर षड्यंत्र रचते रहते थे. निजामुलमुल्क और बार बुरहनुमुल्क ने अपने निजी स्वार्थ के कारण नादिरशाह से मिलकर दिल्ली प्रशासन के विरुद्ध षड्यंत्र रचा और अपने स्वार्थ के लिए राष्ट्रीय हितों को न्योछावर कर दिया.

मुग़ल साम्राज्य के पतन के कारण

5. उत्तराधिकार का त्रुटि पूर्ण नियम

मुगलों में उत्तराधिकारी के नियुक्ति का कोई निश्चित नियम नहीं था. अतः उत्तराधिकारी के लिए भाइयों में युद्ध होता था. इस युद्ध में प्रमुख सैनिक नेता भी भाग लेते थे. जीतनेवाले उत्तराधिकारी को तो राज सिहांसन मिल जाती है, लेकिन यह युद्ध विरोधी दलों के बीच में चलती रहती थी. शक्तिशाली शासक निर्माता केवल अपने निजी स्वार्थ के लिए सम्राट को सिंहासन पर बैठाते और उतार देते थे. 1712 ई. में बहादुर शाह की मृत्यु के पश्चात हुए युद्ध में जुल्फिकार अली शासक निर्माता के रूप में सामने आया. इसके बाद 1713 से 20 ई. तक सैयद बंधु भी शासक निर्माता के रूप में सामने आए और उन्होंने चार राजकुमारों को एक के बाद एक सम्राट बनाए. अंत में वे भी मीर मोहम्मद अमीन और निजामुलमुल्क से मात खा गए. इस प्रकार उत्तराधिकार की त्रुटि पूर्ण नियम ने देश की राजनीति को शिथिल बना दिया और इससे देश आर्थिक और राजनीतिक रूप से अपंग हो गया.

6. मराठों का उत्थान

सबसे महत्वपूर्ण बाहरी कारण जो इस साम्राज्य को ले डूबा वह मराठों का उत्थान था. पेशवाओं ने भी पश्चिमी भारत में मराठा शक्ति को समर्थन दिया और इसके द्वारा मुगलों पर प्रहार किया. उन्होंने वृहत महाराष्ट्र और हिंदू राष्ट निर्माण की नीति अपनाई. हिंदू राष्ट्र का उद्देश्य मुस्लिम राज्य को ख़त्म करके ही पूरा किया जा सकता था. इसके लिए मराठों ने आक्रामक नीति अपनाई और उन्होंने शीघ्र ही पूरी उत्तर भारत पर अपने प्रभाव को कायम कर लिया. एक समय भारत की राजनीति में मराठी सबसे शक्तिशाली थे और वे  भारत को विदेशी आक्रांता अहमद शाह अब्दाली से बचना चाहते थे. सदाशिव भाऊ ने भी  1759 और 1772 ई. में शासक निर्माता की भूमि निभाई. यद्यपि मराठी भारत में एक स्थायी सरकार बनाने में असफल रहे, फिर भी उन्होंने मुगल साम्राज्य के विघटन में बहुत बड़ा योगदान दिया.

मुग़ल साम्राज्य के पतन के कारण

7. सैन्य दुर्बलता

मुगल साम्राज्य के सैन्य व्यवस्था में बहुत सी त्रुटियां थी. सेना को सामंतवादी व्यवस्था ले आधार पर गठन किया जाता था. इस व्यवस्था में सैनिक सम्राट के प्रति नहीं बल्कि मनसबदार के प्रति स्वामी भक्ति रहते थे. सैनिक अपने मनसबदार को ही अपना सर्वे सर्वा समझते थे. इस कारण वे युद्ध या विद्रोह की स्थिति में पूर्ण रूप से राजा का साथ नहीं देते थे. बैरम खां और महाबत खां के विद्रोह ने इस व्यवस्था के दोष को पूर्ण रूप से स्पष्ट किया. इसके बाद उत्तर कालीन मुगलों के समय इस व्यवस्था ने भयंकर रूप ले लिए था.

इसी व्यवस्था के कारण 1748 ई. में एक फ्रेंच कमांडर सिर्फ 230 फ्रांसीसी और 700 भारतीय सैनिकों की सहायता से बिना तोपखाने के तोपखाने से सुसज्जित नवाब के 10,000 सैनिकों को आसानी से पराजित कर दिया था. एक बार डूप्ले ने भी पेरिस में अपने अधिकारियों को लिखा था कि केवल 500 यूरोपीय सैनिक कृष्णा नदी के इधर बेस दुर्गों को आसानी से जीत सकते हैं.

18 वीं शताब्दी में मुगल सेना की सबसे बड़ी निर्बलता उनके गठन प्रक्रिया में थी. सैनिक के रूप में प्राय: मध्य एशिया से आए लोगों को भर्ती किए जाता था. इनको न देश की सुरक्षा से मतलब रहता था और न सम्राट की स्वामी भक्ति करने से. वे लोग केवल भारत में अपना भाग्य बनाने आते थे और केवल पैसे से मतलब रखते थे. ऐसे सैनिक धन के लालच में निसंकोच सम्राट के विरोधियों से भी मिल जाते थे और अपने स्वामी को धोखा देने हिचकते नहीं थे. इस प्रकार किराए के सैनिकों की मदद से साम्राज्य की रक्षा किसी भी हालत में नहीं की जा सकती थी.

मुग़ल साम्राज्य के पतन के कारण

8. आर्थिक दीवालापन

मुगल साम्राज्य की आर्थिक और वित्तीय परिस्थितियां दिन प्रतिदिन बिगड़ जा रही थी और औरंगजेब के अंतिम दिनों में यह और भी बिगड़ गई थी. औरंगजेब के दीर्घकालीन दक्षिण की युद्धों ने न केवल कोष को रिक्त कर दिया बल्कि देश के व्यापार और उद्योगों का भी विनाश कर दिया. सेना ने खड़ी फसलों को राउंड डाला और माल वाहक पशुओं की हरियाली ख़त्म कर डाली. जो शेष बचा उसे मराठों ने राउंड डाला और नाश कर दिया. कृषकों में तंग आकर कृषि करना छोड़ दिया और परवार पालने के लिए लूटमार करना आरंभ कर दी. फलस्वरुप विदेशी कंपनियों को निर्यात करने के लिए माल मिलने में कठिनाई होने लगी. उत्तर कालीन मुगलों के समय में यह वित्तीय कठिनाई और भी बढ़ गई और दूरस्त प्रदेशों ने अपनी स्वाधीनता घोषणा करनी आरम्भ कर दी और केंद्र को कर देना बंद कर दिया. युद्धों, राजनीतिक उथल-पुथल और ऐयाशी में धन की व्यय ने राज कोष को इतना खाली कर दिया कि सैनिकों को भी नियमित रूप से वेतन मिलना बंद हो गया. सम्राटों ने शेष वेतन को भुगतान करने के लिए खालसा भूमि और जागीर देनी  आरम्भ कर दी. जागीरदार का संकट तो तब आया जब देश की कुल भूमि जगीरो में दिए भूमि से कम पड़ गई. इससे देश की आर्थिक स्थिति बदतर होती चली गई.

9. नादिर शाह और अहमद शाह अब्दाली का आक्रमण

1739 ई. में नादिर शाह के आक्रमण से मुगल साम्राज्य को बड़ा आघात पहुंचा और इससे साम्राज्य मरणासन् स्थिति में पहुँच गया.  इससे मुगलों की सैनिक दुर्बलता स्पष्ट हो गई. अब जो लोग मुगलों के नाम से भय खाते थे वे अब सिर्फ उठने लगे और मुगल सत्ता की खुलकर अवहेलना करने लगे. नादिरशाह के उत्तराधिकारी अहमद शाह अब्दाली के आक्रमणों के कारण पंजाब, सिंध और कश्मीर जैसे सीमावर्ती प्रांत मुगलों के हाथ से निकल गए.

मुग़ल साम्राज्य के पतन के कारण

10. यूरोपियों का आगमन

मुगल साम्राज्य की दुर्बलता के कारण 13 वीं शताब्दी में भारत में सैनिक सामंतशाही का बोलबाला हो गया. यूरोपीय कंपनियां सैनिक सामंत बन गई और शीघ्र वे भारतीय रजवाड़ों से व्यापार और सैनिक सत्ता में बाजी ले गई. वास्तव में समकालीन भारतीय समाज गतिहीन ही नहीं अपितु निष्क्रिय भी पड़ा हुआ. इस कारण वे गतिशील और प्रगतिशील यूरोपीय समाज का विरोध करने में असफल रहे. मुगल सम्राट तथा अभिजात वर्ग करोड रुपए के ऐश्वर्य की सामग्रीय विदेशों से मंगवाते रहे. जिस समय पुनर्जागरण आंदोलन यूरोप में एक नवीन युग आरंभ कर रहा था, उस समय भारतीय समाज पर लोक वाद और भक्तिवाद के गहरे सागर में डूबा हुआ था और पलायनवाद में शांति प्राप्त करने का प्रयत्न कर रहा था.

इस प्रकार मुगल साम्राज्य के साम्राटों की अपनी दुर्बलताओं के कारण तथा अनेक समकालीन प्रवर्ती के कारण साम्राज्य की शक्ति क्षीण हो चुकी थी और अंत में मुग़ल साम्राज्य का हमेशा के लिए पतन हो गया.

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