वैदिक कालीन धार्मिक स्थिति का वर्णन कीजिए

वैदिक कालीन धार्मिक स्थिति

वैदिक काल में पुरुष देवताओं की प्रधानता थी. इस काल में सामाजिक और आर्थिक जीवन जितना सरल था, धार्मिक जीवन उतना ही कठिन था. इस समय बहुदेववाद की प्रवृत्ति दिखाई देती थी. यास्क के निरुक्त में तीन देवताओं का उल्लेख मिलता था. ये पृथ्वी में अग्नि, अंतरिक्ष में इंद्र या वायु तथा आकाश में सूर्य थे. ये तीनों देवता तीनों लोकों के स्वामी हैं. ऋग्वेद में प्रत्येक लोक में 11 देवताओं का निवास मानकर उसकी संख्या 33 होने का उल्लेख है इस प्रकार आर्यों का धर्म बहुदेववाद पर आधारित था. आर्यों के सभी देवता प्रकृति के विभिन्न तत्वों के प्रतीक थे. इस कारण यह माना जाता है कि आर्यों का धर्म का आधार प्रकृति-पूजा था.

वैदिक कालीन धार्मिक स्थिति

आर्यों के देवताओं को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:

  • वे देवता जो भूमि के प्रतीक थे. इसमें पृथ्वी, अग्नि, सोम और वृहस्पति आदि थे.
  • वह देवता जो वायुमंडल के प्रतीक थे. इनमें इंद्र, वायु, मारुत, प्रजन्य, रूद्र, आपह आदि थे.
  • वे देवता जो आकाश के प्रतीक थे. वरुण, मित्र, सूर्य, उषा, सावित्री, पूशान, आदित्य, विष्णु अश्विनीकुमार आदि.

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इन देवता इंद्र, वरुण, अग्नि, सोम और सूर्य सबसे प्रमुख माने जाते थे. ऋग्वेद में इनकी स्तुति सबसे अधिक की गई है. ऋग्वेद में करीब 250 सुक्तों में इंद्र का वर्णन किया गया है. इंद्र एक शक्तिशाली देवता था जिसका मुख्य शस्त्र वज्र था. पहले इंद्र को वर्षा और तूफान का भी देवता माना जाता था. लेकिन अब विद्वानों ने मानाकि इंद्र मुख्य रूप से प्रकाश का देवता था. अब प्रजन्य को वर्षा का देवता और मारूत को तूफान का देवता माना गया है. वरुण को शक्ति और नैतिकता का देवता माना गया जो सभी देवताओं को शक्ति प्रदान करता था. वह सभी के अच्छे और बुरे कार्यों को देखता था. मित्र, वरुण का सहयोगी देवता था. अग्नि को आहार का देवता माना गया था. उसी के द्वारा सभी देवताओं को भोजन प्राप्त होता था. ऋग्वेद के करीब 200 सूक्तों में अग्नि का जिक्र मिलता है. इस प्रकार यज्ञ में सभी पदार्थों की आहुति अग्नि को ही दी जाती थी. सूर्य प्रकाश का देवता था और सावित्री, विष्णु, उषा आदि उसके सहायक देवता माने गए थे. सोम आर्यों का प्रिय पेय पदार्थ था. इस कारण उसे भी देवताओं का स्थान दिया गया था.

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आर्यों में यज्ञ, आहुति और पशु बलि को प्रधानता दी गई थी. इसके द्वारा वे देवताओं को प्रसन्न करके शक्ति, संपन्न और विभिन्न पदार्थों और सुविधाओं की प्राप्त करने की आशा करते थे. उन्होंने विभिन्न देवताओं में विश्वास करते हुए एक सर्वोपरि शक्ति की कल्पना की थी. ये बात वेदों के कुछ अंशों से स्पष्ट होता है. इस प्रकार ज्ञान के आधार पर वे धीरे-धीरे एकेश्वरवाद में विश्वास करने लगे थे.

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आर्यों ने मृत्यु के बाद के जीवन तथा स्वर्ग और नर्क की कल्पना भी की थी. परंतु यह उनके जीवन के लिए अधिक महत्वपूर्ण नहीं था. वे इस जीवन से ही अधार प्रेम करते थे और अपनी वृद्धि एवं संपन्नता के लिए देवताओं प्रसन्न करते थे. यह जीवन माया है अथवा कष्टप्रद है, ऐसी उनकी कल्पना न थी.

वैदिक धर्म की कुछ विशेषताएं:

  • धर्म उपयोगितावादी था क्योंकि आर्य निरंतर देवताओं को प्रसन्न करके उनसे अपने लिए सुख-सुविधा, शक्ति, आयु, संपत्ति आदि की मांग करते थे.
  • आर्यों के देवता उदार थे और यदि उन्हें प्रसन्न कर लिया जाता तो मनुष्यों को मुहमांगी वस्तु दे देते थे.
  • देवताओं में पुरुष देवताओं की प्रधानता थी.
  • मूर्ति पूजा का सर्वथा अभाव था.
  • धर्म के आधार पर जीवन के प्रति निराशा न था बल्कि आशा और उत्साह था.
  • धर्म पुरोहितों का समाज में महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं था बल्कि गृहपति ही समस्त धार्मिक कार्यों की पूर्ति कर लेता था.  विशेष अवसरों पर ही पुरोहितों की आवश्यकता होती थी.
  • कर्म सिद्धांत और जीव के आवागमन का सिद्धांत अभी तक पूर्ण रूप से माननीय नहीं थे.

इस प्रकार वैदिक सभ्यता की अपनी कुछ अलग विशेषताएं थी जिनके कारण इसे उत्तर-वैदिक सभ्यता से अलग अपनी पहचान बना ली. डॉ. आर.सी मजूमदार ने ऋग्वेद के महत्व के बारे में लिखा है हिंदू सभ्यता के क्रमिक विकास का अध्ययन करने और समझने के लिए स्रोत ग्रंथ के रूप में ऋग्वेद की श्रेष्ठता करना स्वीकार्यता को स्वीकार करना न्यायपूर्ण है. यही कारण है कि आज के करोड़ों हिंदुओं के लिए यह एक पवित्र धर्म शास्त्र के रूप में अपनी स्थान बनाए हुए है.

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