खुश्चेव की विदेश नीति का वर्णन करें

खुश्चेव की विदेश नीति (Khushchev’s Foreign Policy)

खुश्चेव ने रूस की शासन सत्ता की बागडोर संभालने के पश्चात दूसरे देशों से सम्बन्ध सुधरने के लिए सबसे पहले अपनी नीतियों में बदलाव करना शुरू किया. उसने सबसे पहले अपने पड़ोसी देशों, दक्षिण एशियाई देशों, और लैटिन अमेरिकी देशों के साथ अपने संबंधों को सुधारने का प्रयास किया, क्योंकि उसको इस बात का एहसास हो चुका था कि विश्व के देशों से अपना संबंध सुधारे बिना रूस में स्थिरता कभी आ नहीं सकती है और न एक सशख्त रूस का निर्माण हो पाएगा. अतः उसने इस दिशा में कदम उठाना शुरू कर दिया.  लेकिन उसने जर्मनी के साथ संबंध सुधारने की दिशा में प्रयास नहीं किया और न कुछ खास रूचि दिखाई. उसने सबसे पहले सुदूर पूर्व एशिया में स्थित चीन के साथ संबंधों को सुधारने का प्रयास किया. यद्यपि सोवियत संघ और चीन दोनों ही देशों में साम्यवादी शासन स्थापित किया गया था, लेकिन फिर भी इन दोनों देशों के मध्य दूरी लगातार बढ़ती ही जा रही थी. इसका मुख्य कारण वे एक दूसरे को अपने प्रतिद्वंदी मानते थे. लेकिन फिर भी चीन, सोवियत संघ को ही साम्यवाद का केंद्र मानता था. इसीलिए वह रूस को मंचूरिया और अन्य क्षेत्रों से प्रभाव बढ़ाने से रोक नहीं पा रहा था और रूस भी इन क्षेत्रों में लगातार अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिशों में जुटा हुआ था. इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए और मंचूरिया की आर्थिक संसाधनों के दोहन के लिए रूस ने एक चीनी-सोवियत कंपनी की स्थापना की गई.
खुश्चेव की विदेश नीति
रूस ने पोर्ट अर्थर और दारेन के बंदरगाहों पर अपने नियंत्रण को बढ़ाने का प्रयास किया. इसके साथ ही उसने उत्तरी कोरिया को भी चीन के प्रभाव में आने से रोकने का प्रयास किया. इन्हीं परिस्थितियों के कारण दोनों देशों के संबंध कटुता उत्पन्न होने लगे. इससे दोनों के बीच कभी भी सैन्य टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकता थी. ऐसी संभावित परिस्थितियों को रोकने के लिए 1950 ई. के प्रारंभिक महीनों में सोवियत रूस और चीन के बीच में द्विपक्षीय वार्ताओं का दौर आरंभ हुआ. इन वार्ताओं के माध्यम से दोनों देशों के मध्य सहमति बनी कि वे एक-दूसरे के संप्रभुता का सम्मान करेंगे और जापानी आक्रमण स्थिति में मिलकर मुकाबला करेंगे. इस तरह खुश्चेव ने चीन के साथ अपने संबंधों को सुधारने में काफी हद तक सफलता प्राप्त कर ली थी. लेकिन इसके बाद भी दोनों देश एक-दूसरे के प्रति सशंकित बने रहे और दोनों को बीच अविश्वास का वातावरण बना रहा.
खुश्चेव की विदेश नीति
चीन के साथ अपना संबंध सुधारने के बाद खुश्चेव ने दक्षिण एशियाई देशों और लैटिन अमेरिकी देशों के साथ अपने संबंधों को सुधारने का प्रयास किया. उसने वर्मा (म्यानमार), भारत तथा अन्य दक्षिण एशियाई देशों की ओर भी मित्रता का हाथ बढ़ाया. उसने इन देशों के साथ रूस के द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया. उसने इन देशों में मूलभूत सुविधाओं के लिए इन देशों की शर्तों पर ऋण प्रदान किया और सैन्य सहायता भी प्रदान की. लैटिन अमेरिकी देशों के साथ भी उसने संबंधों को और विकसित करने की दिशा में बहुत प्रयास किया. उसकी कोशिशों का परिणाम यह हुआ कि फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व में क्यूबा में साम्यवादी शासन की स्थापना हुई. इसके अतिरिक्त उसने विश्व की बदलती  हुई परिस्थितियों के परिणामस्वरूप स्वतंत्र हो चुके नये देशों के साथ भी उसने मित्रता का संबंध स्थापित किए तथा उन्हें सैन्य और आर्थिक सहायता प्रदान की. खुश्चेव ने मिश्र को भी ब्रिटिश-इजराइल-फ्रांस गुट के विरुद्ध सहायता देने का कार्य किया. इससे मिश्र के साथ उनके संबंध मजबूत हुए.
खुश्चेव की विदेश नीति
 
खुश्चेव ने विश्व के बहुत से देशों के साथ अपना संबंध बनाया लेकिन उनको इस बात का भी एहसास थी कि पड़ोसियों के साथ मधुर संबंध बनाए बिना रूस में स्थिर शासन की स्थापना नहीं की जा सकती है. अतः उसने अपने पड़ोसी देशों के साथ भी संबंध सामान्य बनाने का प्रयास किया. वह अच्छी तरह जानता था कि देश की सीमाओं को सुरक्षित किए बिना साम्यवादी प्रभाव को विश्वव्यापी नहीं बनाया जा सकता है. इस दिशा में उसने तुर्की, फिनलैंड, आस्ट्रेलिया आदि देशों के साथ अपने संबंध सुधारने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया. उसने तुर्की की सहायता करके उसे नाटो से अलग करने की कोशिश की. रूस ने जुलाई 1955 ई. में जेनेवा शिखर सम्मेलन में भी भाग लिया. इस सम्मेलन में व्यापार, निशस्त्रीकरण तथा सह-अस्तित्व के प्रश्नों पर गहनता से विचार- विमर्श किया गया.
 
इस प्रकार खुश्चेव ने स्टालिन की मृत्यु के पश्चात उसके आदर्शों और सिद्धांतों का परित्याग तो कर दिया किंतु उसने रूस की आंतरिक और बाह्य नीतियो में महत्वपूर्ण परिवर्तन करके सोवियत संघ को एक विश्व शक्ति के रूप में प्रतिस्थापित करने का प्रयास किया.

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