जैन धर्म का प्रसार बौद्ध धर्म के समान क्यों नहीं हो पाया?

जैन धर्म

जैन धर्म, भारतीय संस्कृति की विकास में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. लेकिन दुर्भाग्यवश यह बौद्ध धर्म के समान लोकप्रिय नहीं हो सका. जैन धर्म के अनुयायियों की संख्या भी सीमित रह गई और इसे भारत के प्रमुख धर्मों के रूप में भी खास पहचान कभी मिल नहीं पाया. बौद्ध धर्म के समान अन्य देशों में भी इसका प्रचार-प्रसार ना हो सका. 

जैन धर्म का प्रसार

जैन धर्म के प्रसार भारत तक सीमित रहने तथा ज्यादा लोकप्रिय ना होने के कारण

1. अत्याधिक कठोर एवं अव्यवहारिक सिद्धांत

जैन धर्म के सिद्धांत अत्यंत कठोर एवं अव्यवहारिक थे. उन सिद्धांतों का पालन करना जनसाधारण के लिए संभव नहीं था. जैन धर्म के अनुसार मोक्ष प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या, शरीर को कष्ट देना, वस्त्र न धारण करना, उपवास करना आदि अनिवार्य था. इसी काल के दौरान बौद्ध धर्म ने भी मोक्ष प्राप्त करने के सिद्धांतों का आह्वान किया था जो कि जैन धर्म की तुलना में अत्यंत सरल और व्यवहारिक था. अतः जनसाधारण का झुकाव बौद्ध धर्म के सरल सिद्धांतों की ओर हुआ. लोग जैन धर्म के कठोर सिद्धांतों को अपनाने के बजाय बौद्ध धर्म का चुनाव किया. अत: जैन धर्म के कठोर और कष्टप्रद सिद्धांतों ने जनसाधारण को अपनी ओर आकर्षित करने में असफल रहा. इस कारण  जैन धर्म लोगों के बीच लोकप्रिय ना हो पाया.

2. क्लिष्ट जैन-दर्शन

जैन-दर्शन इतना क्लिष्ट था कि इसे समझ पाना जनसाधारण के लिए संभव न था. स्यादवाद, अनेकान्तवाद, द्वैतवादी तत्वज्ञान आदि जनसाधारण के समझ से परे था. यही कारण लोगों का झुकाव जैन धर्म की ओर न हो पाया. 

3. अहिंसा पर अत्याधिक बल देना

जैन धर्म के सिद्धांत अहिंसा पर अत्याधिक बल देते हैं. इनका विश्वास है कि समस्त प्रकृति में प्राण है और वह जीवित हो सकती है. जैन धर्म के अनुसार समस्त प्राणी, बीज, अंकुर, पुष्प, अंडे, गुफाएं और नमी आदि सजीव हैं. साधारण मनुष्यों के लिए उनके व्यवहारिक जीवन में पेड़-पौधों, जीवाणुओं और पशुओं के लिए इतना ज्यादा अहिंसात्मक जीवन का पालन करना संभव नहीं था. अत: जनसाधारण के लिए जैन धर्म द्वारा प्रतिपादित अहिंसा के सिद्धांतों पर इतनी कठोरता से पालन न कर पाने के कारण उनकी रूचि जैन धर्म के प्रति घट गई. यद्यपि बौद्ध धर्म में भी अहिंसा का सिद्धांत दिया गया था, लेकिन जैन धर्म की तुलना में यह इतना कठोर नहीं था. इस कारण बौद्ध धर्म लोकप्रिय हो गया और जैन धर्म एक दायरे में ही सीमित रह गया.

जैन धर्म का प्रसार

4. मैलिकता का अभाव

किसी भी धर्म के प्रसार के लिए मौलिकता को बनाए रखना अत्यंत आवश्यक होता है. किंतु महावीर ने वैदिक धर्म से मतभेद रखते हुए भी समझौता की नीति का पालन किया. उनकी ये समझौता की नीति मानसिक जगत में आकर्षक एवं प्रभावशाली प्रमाणित नहीं हुआ.

5. राजकीय समर्थन का अभाव

 

जैन धर्म को बौद्ध धर्म की तरह शासकों का समर्थन प्राप्त नहीं था. हालांकि कुछ भारतीय शासकों ने जैन धर्म के प्रति उदार की नीति अपनाई किंतु उनकी यह नीति जैन धर्म के व्यापक प्रसार के लिए पर्याप्त नहीं थी. बौद्ध धर्म को अशोक, कनिष्क और हर्ष जैसे महान शासकों का समर्थन था और इनके प्रचार-प्रसार में इन शासकों ने काफी योगदान भी दिए.  लेकिन जैन धर्म के प्रचार-प्रसार में किसी भी शासकों ने रूचि नहीं दिखाई. अतः जैन धर्म का प्रसार देश के कुछ भागों तक ही सीमित रह गया.

 

6. प्रचार के साधनों का अभाव

जेनसन घूमने बौद्ध संघ के समान अपने धर्म के प्रचार कार्य में रुचि नहीं दिखाई उन्होंने विदेशों में भी जैन धर्म के प्रचार करने का कोई प्रयास नहीं किया बौद्ध धर्म के प्रचार में बहुत बिच्छू में प्रमुख भूमिका निभाई थी लेकिन महावीर के अनुयायियों ने ऐसा नहीं किया सर प्रचारकों के अभाव के कारण चयन धर्म किसी विदेशी यात्रा को अपनी ओर आकृष्ट नहीं कर सका यही कारण था कि किसी विदेशी लेखकों में जैन धर्म के प्रति लिखने में कोई रुचि नहीं दिखाई अता जैन धर्म के प्रचार प्रसार में कमी होने के कारण जैन धर्म का व्यापक प्रचार नहीं हो सका.

जैन धर्म का प्रसार

7. ब्राह्मण एवं बौद्ध धर्म से प्रतिस्पर्धा

इस समय जैन धर्म के अलावा ब्राह्मण और बौद्ध धर्म का समाज में फाफी प्रभाव था. जैन धर्म का प्रतिस्पर्धा ब्राह्मण और बौद्ध धर्म दोनों धर्मों से था. आपसी धार्मिक प्रतिस्पर्धाओं के कारण है प्रत्येक धर्म अपना-अपना अस्तित्व बनाए रखने और इसके प्रचार-प्रसार के लिए प्रयास में लगे हुए थे. छठी शताब्दी में ब्राह्मण धर्म में बहुत सी कुरीतियां उत्पन्न हो गई थी. इन कुरीतियों को देखकर लोग ब्राह्मण धर्म से विमुख होने लेंगे थे. ऐसे में समाज में बौद्ध और जैन धर्म के बढ़ते प्रभाव को देखकर ब्राह्मण धर्म के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए ब्राह्मणों को चुनौती का सामना करना पड़ रहा था. अतः उन्होंने ब्राह्मण धर्म में कई सुधार किए. इस कारण ब्राह्मण धर्म पुनः लोकप्रिय धर्म बन गया और लोग इसके ओर आकर्षित होने लगे. इसके विपरीत जैन धर्म के कठोर सिद्धांत लोगों को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाया. अतः धर्म के प्रचार-प्रसार के इस आपसी प्रतिस्पर्धा में जैन धर्म पीछे रह गया. इसलिए इनका प्रसार नहीं हो पाया.

8. जैन संघों की दोषपूर्ण संगठन प्रणाली

जैन संघों के संगठन अत्यंत दोषपूर्ण थे. इनमें बौद्ध संघ के समान जनतंत्रात्मक नहीं था. जैन संघ में संपूर्ण शक्ति गणधरों के हाथों में थी. इस कारण जैन संघ के अन्य कर्मचारियों में असंतोष की भावना उत्पन्न होने लगी. जैन संघों की विकसित वैधानिक व्यवस्था भी नहीं थी. अतः इन सभी कारणों से जैन संघ अपने उद्देश्य को पूरा करने में असफल रहे.

9. जैन धर्म को दो संप्रदायों में विभक्त हो जाना

ई.पू. चौथी शताब्दी में जैन धर्म दो संप्रदायों, दिगंबर और श्वेतांबर में विभक्त हो गया. इस विभाजन ने जैन धर्म के विकास में बहुत बड़ी बाधा पहुंचाई. इस आंतरिक फूट के कारण जैन धर्म की शक्ति बहुत घट गई. इस कारण पूर्वी भारत में जैन धर्म का जो प्रभाव था वह भी खत्म होता चला गया और लोगों का विश्वास जैन धर्म से खत्म होने लगा. 

जैन धर्म का प्रसार

10. जाति प्रथा

महावीर स्वामी जाति प्रथा के घोर विरोधी थे. उन्होंने ऊंच-नीच, छुआछूत जैसे बुराइयों का विरोध किया. लेकिन बाद में जैन धर्मावलंबियों के बीच में जाति-प्रथा  ऊंच-नीच जैसे कुरीतियां फिर से प्रचलित हो गई. जैन संघ में भी उच्च वर्गों को ही प्रवेश दिया जाने लगा. इस कारण निम्न जातियों के लोगों में असंतोष की भावना पनपने लगी. इस प्रकार जाति प्रथा ने जैन धर्म को शक्तिहीन कर दिया. शुरू में जैन धर्म के द्वारा जाति प्रथा और अन्य कुरीतियों का विरोध किया जाता था. इन्हीं कारणों से ही जनसाधारण जैन धर्म का अनुसरण किया करते थे. लेकिन इन बुराइयों के फिर से शुरू होने से लोगों का विश्वास जैन धर्म से धीरे-धीरे विमुख होने लगा.

11. जैन सहित्यों की कठिन भाषा

शुरुआत में जैन साहित्य की रचना प्राकृत भाषा में की गई थी. उस समय जनसाधारण के बीच में प्राकृत भाषा प्रचलित थी. अतः इन साहित्यों को पढ़ कर समझना जनसाधारण के लिए आसान था. लेकिन कालांतर में जैन साहित्यों की रचना संस्कृत भाषा में की जाने लगी. संस्कृत भाषा ज्यादा प्रचलित न होने के कारण लोगों के लिए उन साहित्यों को पढ़कर समझना अत्यंत कठिन हो गया. इस कारण लोगों की रूचि जैन साहित्य से घटने लगी और जनसाधारण का आकर्षण जैन धर्म के प्रति उदासीन हो गया.

जैन धर्म का प्रसार

12.  कला द्वारा प्रचार का अभाव

किसी भी संदेश को प्रचार करने के लिए कला एक सशक्त माध्यम होती है. लेकिन जैन कला जीवन और धर्म के समन्वय को स्थापित नहीं कर सकी. जैन कला के माध्यम से जैन धर्म के प्रचार का काम कुशलता उपयोग नहीं किया जा सका. अतः जैन धर्म के प्रचार ठीक से नहीं हो पाया.

13. वैदेशिक आक्रमण

मध्य काल में भारत पर अनेक विदेशी आक्रमणकारियों ने आक्रमण किया. इन विदेशी आक्रमणकारियों ने भारतीय धर्मों को काफी क्षति पहुंचाई. जैन धर्म भी इस आक्रमणकारियों के प्रभाव से बच नहीं पाया. इन आक्रमणकारियों ने जैन मंदिरों, मूर्तियों और साहित्यों का नाश कर दिया. जैन धर्म के लोग अहिंसा के पुजारी होने के कारण इन आक्रमणकारियों का सामना नहीं कर सके. इन आक्रमणकारियों के द्वारा जैन धर्म को अत्यधिक क्षति पहुंचाए जाने के कारण जैन धर्म के प्रचार प्रसार को काफी धक्का पहुंचा. इसके बाद जैन धर्म पुन: अपनी लोकप्रियता को हासिल नहीं कर पाया.

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