द्वितीय विश्व युद्ध के कारण और परिणामों का वर्णन करें

द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-1945 ई.)

द्वितीय विश्वयुद्ध 1939 ई. से 1945 ई. तक चला. युद्ध की शुरुआत जर्मनी के द्वारा 1 सितम्बर 1939 ई. को पोलैंड पर आक्रमण करने से हुई. पोलैंड ने वीरतापूर्वक जर्मन सेना का सामना किया, लेकिन रूस के द्वारा जर्मनी की सहायता करने के कारण पोलैंड को हार का सामना करना पड़ा. पोलैंड पर जर्मनी और रूसी सेना के द्वारा कब्जा करते देखकर पोलैंड के समर्थन में इंग्लैंड तथा फ्रांस से सैन्य हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया. इसी के साथ द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ हो गया.

द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण

द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण

1. प्रथम विश्व युद्ध एवं वार्साय की संधि

द्वितीय विश्वयुद्ध के होने के कारणों पर ध्यान दिया जाए तो हम पाते हैं इस युद्ध के शुरू होने का सबसे मुख्य कारण प्रथम विश्वयुद्ध ही था. प्रथम विश्वयुद्ध के बाद वर्साय की संधि की गई थी. यह संधि पूरी तरह जर्मनी के खिलाफ था. एक तरह देखा जाए तो यह संधि शांति की संधि नहीं बल्कि 20 वर्षों के लिए युद्ध विराम की संधि थी. इस संधि में जर्मनी के खिलाफ प्रतिरोध की भावना से कठोरता पूर्वक व्यवहार किया गया ताकि उसे स्थायी रूप से शक्तिहीन बनाया जा सके. जर्मनी पर युद्ध हर्जाना का इतना बोझ लादा गया कि उसे चुकाना जर्मनी के लिए असंभव था. जर्मनी को इस संधि पर बलपूर्वक हस्ताक्षर कराया गया था. जर्मनी इस आपमान को सहन नहीं कर पा रहा था. इसी कारण जर्मनी के अंदर प्रतिशोध लेने की भावना बढ़ती जा रही थी और उनका बदला लेने के लिए अंदर ही अंदर युद्ध की तैयारियां करने लगा था.

2. दलबंदी

प्रथम विश्व यद्ध के दौरान विश्व दो तमाम देश दो खेमे में बट गया था. उसी प्रकार द्वितीय विश्वयुद्ध में भी यूरोप के लगभग सभी देश दो खेमे में बैठ गए थे. इन खेमों में जहां एक ओर जर्मनी, इटली और जापान थे, दूसरी ओर फ्रांस, पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया, युगोस्लाविया तथा रुमानिया था. जर्मनी, जापान तथा इटली के खेमे को दूरी राष्ट्र कहा जाता था. फ्रांस, पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया युगोस्लाविया तथा रुमानिया के खेमे को मित्र राष्ट्र कहा जाता था. युद्ध प्रारंभ होने के बाद इंग्लैंड मित्र राष्ट्रों में तथा रूस धुरी राष्ट्र में शामिल हो गया. युद्ध के दौरान जर्मनी के द्वारा रूस पर आक्रमण करने के कारण रूस मित्र राष्ट्र में मिल गया. दूसरी ओर जापान के द्वारा अमेरिका के सैन्य बेस पर्ल हार्बर पर हमला करने के कारण अमेरिका भी इस विश्वयुद्ध में कूद पड़ा और वह मित्र राष्ट्रों की ओर से युद्ध करने करना शुरू कर दिया. इस प्रकार पोलैंड और जर्मनी का झगड़ा विश्वयुद्ध में बदल गया.

द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण

3. सैन्यवाद

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद 1919 ई. में वर्साय की संधि हुई. इस संधि के द्वारा जर्मनी को निर्बल बनाने के उद्देश्य से उसका निशस्त्रीकरण कर दिया गया था. लेकिन फिर भी फ्रांस का जर्मनी के प्रति भय नहीं खत्म हुआ. अत: वह भी अंदर ही अंदर जर्मनी से संभावित हमले का मुकाबला करने के लिए सैन्य तैयारियां करने में लगा रहा. 1933 ई. में जब जर्मनी में हिटलर का शासन आरंभ हुआ तो उसने वर्साय की संधि को मानने से इंकर कर दिया और अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाना आरंभ कर दिया. उसने देश में सैनिक सेवा अनिवार्य की तथा हथियारों के उत्पादन को बढ़ाया. हिटलर के द्वारा सैनिक शक्ति को बढ़ाते देखकर इंग्लैंड के भी कान खड़े हो गए. अत: वह भी अपनी सैन्य शक्ति में वृद्धि करने लगा. यह देखकर  जापान, इटली तथा रूस ने भी अपनी सैन्य शक्ति को बढ़ाना शुरू कर दिया. इस प्रकार सभी देशों के द्वारा सैनिक तैयारियां करने के कारण युद्ध की संभावना और ही बढ़ गई.

4. राष्ट्र संघ की निर्बलता 

प्रथम विश्वयुद्ध बाद लोगों ने भविष्य में ऐसी समस्याओं को शांतिपूर्वक ढंग से सुलझाने के उद्देश्य से एक अंतरराष्ट्रीय संस्था की स्थापना की गई. इस संस्था का नाम राष्ट्र संघ रखा गया, लेकिन राष्ट्र संघ अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाया. इस कारण बहुत से राष्ट्र राष्ट्र संघ से अलग हो गए और उन्होंने राष्ट्र संघ के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया. ऐसी हालत में राष्ट्र संघ उन देशों के विरुद्ध कार्यवाही ना कर पाया. इस कारण उसकी निर्भलता और स्पष्ट हो गई. इस वजह से विश्व के तमाम देशों का राष्ट्र संघ के प्रति विश्वास खत्म हो गया.

द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण

5. साम्राज्यवाद

प्रथम विश्वयुद्ध के प्रमुख कारणों से एक साम्राज्यवाद भी था. इस युद्ध के बाद भी साम्राज्यवाद की भावनाएं खत्म नहीं हुई थी. जर्मनी इटली वर्साय की संधि का विरोध किया तथा वह उपनिवेश स्थापित करने के प्रयास करने शुरू कर दिया. इधर जापान भी अपनी साम्राज्यवादी नीतियों पर काम कर रहा था. वह लगातार चीन पर अपनी साम्राज्यवाद स्थापित करने की कोशिश कर रहा था. इस प्रकार विश्व के तमाम देशों के साम्राज्यवादी नीति एक दूसरे के हितों से टकराना शुरू हो गई. ऐसे में युद्ध की संभावना बढ़ गई.

6. तानाशाही शासकों का उदय

द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले यूरोप में अनेक देशों में तानाशाही शासन का स्थापित हुआ था. इसी प्रकार प्रथम विश्व युद्ध के बाद में जर्मनी में हिटलर एक तानाशाह शासक के रूप में उदय हुआ. उसने वर्साय की संधि को अस्वीकार कर दिया. वह जर्मनी के खोए हुए सम्मान को फिर से प्राप्त करना था. अत: इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने अपनी सैन्य शक्ति को बढ़ाना शुरू कर दिया और उसने ऑस्ट्रिया तथा चेकोस्लोवाकिया पर हमला करके उस पर अपना अधिकार कर लिया.

द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण

इसी प्रकार इटली में भी मुसोलिनी नामक तानाशाह शासक का उदय हुआ. उसने इटली में फासीवाद का की स्थापना की. उसका विचार था कि उसने प्रथम विश्वयुद्ध मित्र राष्ट्रों का सहयोग किया लेकिन उसे उचित इनाम नहीं मिला. अतः हुआ भी मित्र राष्ट्र और वर्साय की संधि के खिलाफ हो गया था. इसी प्रकार स्पेन में भी तानाशाह शासन की भावना बढ़ती चली गई और स्पेन के जनरल फ्रेंको नामक व्यक्ति ने इटली और जर्मनी की सहायता से गणतंत्र शासन के विरुद्ध विद्रोह किया. उन्हें इस विद्रोह में सफलता मिली. इस प्रकार यूरोप के विभिन्न देशों में तानाशाही शासकों का उदय हुआ. इन शासकों ने अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए अपनी-अपनी  सैन्य शक्तियों का विस्तार करना आरंभ कर दिया. इस प्रकार यूरोप के देशों की आपसी हितें एक-दूसरे से टकराने लगी थी, जिससे युद्ध की संभावना और बढ़ गई.

7. विचारधाराओं का टकराव

द्वितीय विश्वयुद्ध पहले यूरोपीय देशों में दो प्रकार की विचारधाराएं प्रचलित थी- जनतन्त्रात्मक और एकतंत्रात्मक. इंग्लैंड, फ्रांस और अमेरिका जनतन्त्रात्मक विचारधारा वाले देश थे जबकि इटली, जर्मनी और जापान एकतंत्रात्मक विचारधारा के समर्थक थे. अत: धीरे-धीरे इन विभिन्न विचारधाराओं वाले देशों के बीच विचारधाराओं का टकराव होना शुरू हो गया. इटली के तानाशाह मुसोलिनी ने कहा था कि दोनों विचारधाराओं के संघर्ष में समझौता होना असंभव है, अत: इस संघर्ष कारण या तो हम रहेंगे अथवा वह रहेंगे. इस से यह स्पष्ट हो गया कि इन दो अलग विचारधाराओं के टकराव होने के कारण युद्ध होना तय था. 

द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण

8. राष्ट्रीय समाजवाद

जर्मनी के लोगों के मन में यह भावना जागृत हो गया था कि वे सभी मनुष्यों में श्रेष्ठ हैं. अतः शासन करने का अधिकार केवल उन्हीं को है. इस प्रकार समाजवाद की भावना अत्यंत हानिकारक साबित हुई. प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात जर्मनी को विभिन्न भागों में विभक्त कर दिया गया था और इन अलग-अलग भागों में अलग-अलग राष्ट्र शासन कर रहे थे. ऑस्ट्रिया, चेकोस्लोवाकिया तथा पोलैंड के हिस्सों में रहने वाले जर्मनों के कारण अत्यंत गंभीर समस्या उत्पन्न होने शुरू हो गए. हिटलर विदेशों में रहने वाले जर्मनों को जर्मनी में  मिलाना चाहता था. जर्मनी ने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए शक्ति का सहारा लिया. इस समय फ्रांस और इंग्लैंड ने तुष्टीकरण की नीति अपनाई और उन्होंने जर्मनी के इस कार्रवाई पर हस्तक्षेप नहीं किया जिसके कारण हिटलर की महत्वकांक्षाएं बढ़ती चली गई और आगे चलकर यह विश्व युद्ध में बदल गया. यदि इसी समय जर्मनी को ऑस्ट्रिया पर अधिकार करने से रोका होता तो संभवत द्वितीय विश्वयुद्ध न होता. 

9. तुष्टिकरण की नीति

मित्र राष्ट्रों के द्वारा तानाशाही शासकों के प्रति तुष्टीकरण की नीति के परिणाम स्वरूप तानाशाही शासक अत्यधिक शक्तिशाली होते चले गए. मित्र राष्ट्र द्वारा तुष्टीकरण की नीति का पालन करने के कारण मित्र राष्ट्रों में परस्पर झगड़ा होना शुरू हो गया. इंग्लैंड और अमेरिका, जर्मनी के प्रति उदारता की भावना से व्यवहार करना चाहते थे, क्योंकि उनका विचार था कि इस प्रकार व्यवहार करने से जर्मनी भविष्य में युद्ध नहीं करने करेगा. इसके अलावा इंग्लैंड, रूस के बढ़ती साम्यवाद से चिंतित था. इस स्थिति में रूस को रोकने के लिए जर्मनी का उत्थान आवश्यक था. अत: उसने भी चुप्पी साध ली. इसके अलावा इंग्लैंड, यूरोप के झगड़ों में फिर से पड़ना नहीं चाहता था. फ्रांस, जर्मनी के प्रति कठोर नीति का पालन करना चाहता था. इस प्रकार मित्र राष्ट्रों में पारस्परिक मतभेद होने के कारण तानाशाह ने इसका फायदा उठाया और हिटलर ने ऑस्टिया को अपने अधिकार में ले लिया इसके बाद चेकोस्लोवाकिया में भी अपना कब्जा जमाया. इधर इटली ने भी अभिसीनिया पर  अधिकार कर लिया. फिर भी इंग्लैंड ने उन पर कोई ठोस कार्यवाही नहीं की. जिसके कारण तानाशाह हिटलर की हौसला और महत्वाकांक्षा दिन-प्रतिदिन बढ़ती चली गई जो कि भविष्य में युद्ध की संभावना को और बढ़ा दिया.

द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण

10. अनुक्रमण संधि

रूस की साम्यवादी नीति के कारण इंग्लैंड और रूस के संबंधों में तनाव उत्पन्न हो गया था. मित्र राष्ट्र रूस पर विश्वास नहीं करते थे. इसी कारण रूस को म्यूनिख सम्मेलन में आमंत्रित नहीं किया गया था. रूस पश्चिम में जर्मनी एवं पूर्व में जापान से घिरा था. अत: वह मित्र राष्ट्रों से मित्रता करना चाहता था. इंग्लैंड एवं पांचवी जर्मनी के विरुद्ध रूप से संधि करना चाहते थे, किंतु रूस की कुछ शर्तों को इंग्लैंड स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था. अत: रूस जो पहले ही मित्र राष्ट्रों से नाराज था, वह और ही नाराज हो गया तथा उसने 1939 ई. में जर्मनी के साथ अनाक्रमण संधि कर ली. इस संधि से जर्मनी को अत्याधिक लाभ हुआ क्योंकि इससे उसकी पूर्वी सीमाएं सुरक्षित हो गई.

इस प्रकार चारों ओर से अपनी स्थिति को सुदृढ़ करके जर्मनी ने 1 सितंबर 1939 ई. को पोलैंड पर आक्रमण कर दिया. पोलैंड की सहायता करने के लिए इंग्लैंड और फ्रांस ने जर्मनी की ओर से तथा जर्मनी की ओर से रूस ने हस्तक्षेप किया. इसी के परिणामस्वरूप द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ हो गया.

द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणाम

द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणाम

द्वितीय विश्वयुद्ध लगभग 6 वर्षों तक लड़ा गया था. द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणाम के दृष्टिकोण से मानव इतिहास का सबसे भयावह एवं विनाशकारी युद्ध था. इस युद्ध में लाखों लोग अपने प्राणों से जान धो बैठे और लाखों संख्या में लोग घायल हुए. इस युद्ध के प्रभाव इतने व्यापक है कि विश्व युद्ध खत्म होते ही इतिहास के एक युग का अंत हो गया और इसके एक नए युग का आरंभ हुआ. युद्ध के बाद विश्व में युद्ध की विनाशलीला को देखकर आने वाले समय में होने वाले युद्ध की संभावनाओं के बारे में कल्पना मात्र से ही लोगों के मन में भय, चिंता, अनिश्चितता और तनाव की स्थिति लंबे समय तक बनी रहे बनी रही.

1. युद्धरत देशों की अपार क्षति

द्वितीय विश्व युद्ध में भाग लेने वाले सभी देशों को गंभीर क्षति उठानी पड़ी. इस युद्ध में सबसे ज्यादा क्षति रूस को हुई. रूस के स्टालिनग्राड के युद्ध में मारे गए रूसी नागरिकों की संख्या तो इस पूरे विश्व युद्ध में मारे गए अमेरिकनों के संख्या के बराबर थी. इसका मुख्य कारण 1944 ई. तक धुरी राष्ट्रों के विरोध में पश्चिमी देशों ने कोई दूसरा मोर्चा नहीं खोला था. इस कारण जर्मनी का हमला केवल रूस के मोर्चों पर ही हो रहा था. इस युद्ध में रूस को लगभग 1 अरब 28 करोड़ डॉलर की संपत्ति का नुकसान उठाना पड़ा. लगभग 17 हजार नगर नष्ट हो गए और उसके 70 लाख नागरिक मारे गए. इस युद्ध में ब्रिटेन को भी काफी क्षति उठानी पड़े. उसके लगभग चार लाख 45 हजार नागरिक मारे गए. उनका अंतरराष्ट्रीय व्यापार कम हो गया. कोयले एवं कपड़े के उत्पादन में कमी आ गई. इसके परिणाम स्वरूप उसे 1946 ई. में संयुक्त राज्य अमेरिका से 3 खरब $75 करोड़ डॉलर का कर्ज लेना पड़ा. यह कर्ज 2% ब्याज की दर से 50 वर्ष का की अवधि में चुकाने पर सहमति बन. फ्रांस के भी 3 लाख 80 हजार नागरिक मारे गए. उनका कृषि उत्पादन 38% कम हो गया और औद्योगिक उत्पादन 30% घट गया. 1945 ई. तक फ्रांस के दैनिक जीवन में इस्तेमाल होनेवाली वस्तुओं की कीमत में 296% तक की वृद्धि हो गई. इस युद्ध में इटली के 6 लाख 36 हजार से ज्यादा सैनिक मारे गए. उसके अलावा उनको अन्य धन-संपत्ति के नुक्सान का सामना करना पड़ा. हिरोशिमा और नागासाकी में अमेरिका के द्वारा परमाणु बम गिराए जाने कारण जापान में लाखों लोग काल के गाल में समा गए. परमाणु बम के हमले के कारण जापान का मनोबल टूट गया. इसके अलावा इस युद्ध में चेकोस्लोवाकिया, पोलैंड, हंगरी, युगोस्लाविया, यूनान तथा अल्बानिया को भी काफी क्षति उठानी पड़ी.

2. यूरोपीय प्रभुत्व की समाप्ति

द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात एक नवीन युग का जन्म हुआ. इस नवीन युग में विश्व में यूरोपीय देशों का प्रभाव समाप्त हो चुका था. युद्ध से पहले पूरे विश्व में यूरोपीय शक्तियों का दबदबा हुआ करता था. लेकिन द्वितीय विश्वयद्ध ने यूरोपीय शक्तियों को इतना कमजोर कर दिया था कि उन्हें फिर से अपने देश की स्थिति संभालने के लिए कई दशकों तक संघर्ष करना पड़ा. इस युद्ध के परिणामस्वरूप  धुरी राष्ट्रों ने अपने साम्राज्य के बहुत से हिस्से गवां दिए. ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी आदि देश शक्तिहीन हो गए.

द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणाम

3. दो महाशक्तियों का उदय

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद लगभग सभी यूरोपीय देश शक्तिहीन हो गए. इसके बाद एक नए युग का जन्म हुआ. इस युग में दो विश्व महाशक्तियों का उदय हुआ. ये महाशक्तियां रूस और अमेरिका थे. युद्ध के खत्म होने तक रूस विजयों के द्वारा अपनी सीमाओं को काफी विस्तृत कर चुका था. उनकी सीमायें पश्चिम तक फैल चुकी थी. पोलैंड, रोमनिया, हंगरी, बुल्गारिया, अल्बानिया एवं चेकोस्लोवाकिया आदि देश की रूस के मित्र बन गए. इस समय जापान का पतन हो चुका था. ब्रिटेन भी आर्थिक रूप से जर्जर हो चुका था. जर्मनी और इटली की शक्ति खत्म हो गई. चीन गृह युद्ध में चल रहा था. अत: उसका मुकाबला करने वाली एक ही शक्ति बच गई हुआ थी वो था अमेरिका. अतः इस द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका और रूस विश्व की दो महाशक्तियों के रूप में उभरे.

4. शीत युद्ध का आरंभ

द्वितीय विश्वयुद्ध के खत्म होते ही अमेरिका और रूस विश्व महाशक्ति के रूप में उभरे. दोनों देश परस्पर एक दुसरे के विरोधी थे. अत: दोनों देशों के बीच तनाव का वातावरण बनने लगा. इसके साथ ही दोनों देशों के बीच युद्ध की संभावना प्रबल होने लगी थी. दोनों एक दसरे के खिलाफ सैन्य तैयारियों में लग गए. इसी के साथ ही शीत युद्ध का आरंभ हो गया. ये शीत युद्ध काफी लम्बे समय तक चली.

द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणाम

5. साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विघटन

विश्व युद्ध के ख़त्म होने के साथ ही साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विघटन हो गया. इस विश्व युद्ध के दौरान वैसे कई देशों में यूरोपीय देशों के खिलाफ स्वतंत्रता का संग्राम भी चला रहे थे जो यूरोपीय देशों के साम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी विचारधाराओं के कारण इन देशो के गुलाम बने हुए थे. ये देश इस विश्व युद्ध में मित्र राष्ट्रों का समर्थन समर्थन कर रहे थे. विश्व युद्ध के ख़त्म होने के बाद यूरोपीय देश पूरी तरह शक्ति हीन हो चुके थे. अत: विश्व युद्ध के समाप्त होते ही यूरोपीय देशों के साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का गुलाम बने देश स्वतंत्रता प्राप्त कर लिए.

6. प्रादेशिक संगठनों का निर्माण

विश्व युद्ध खत्म होते ही अमेरिका और रूस विश्व महा शक्तियों के रूप में उभरे. इसके साथ ही दोनों के बीच में शीत युद्ध की स्थिति बनने लगी. इस स्थिति को देखकर अमेरिका ने अपने प्रभाव में वृद्धि करने के लिए क्षेत्रीय एवं प्रादेशिक संगठनों का गठन करना शुरू कर दिया. इन संगठनों में मुख्य रूप से नाटो, वारसा पैक्ट, सीटो एवं ओ.ए.एस. आदि शामिल हैं.

द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणाम

7. मानवतावाद

विश्वयुद्ध के दौरान कमजोर राष्ट्रों को यूरोप के शक्तिशाली और साम्राज्यवादी ताकतों का शिकार करना पड़ा. उन ताकतों के द्वारा इस युद्ध से पहले और बाद में कमजोर राष्ट्रों के अल्पसंख्यकों के अधिकारों को कुचला गया और उन पर जुल्म ढाया गया. इससे इसे देखकर संयुक्त राष्ट्र संघ ने मानव अधिकारों की घोषणा पत्र प्रकाशित किया. इस घोषणा पत्र के द्वारा संयुक्त राष्ट्र ने मानव अधिकारों की रक्षा तथा कमजोर अल्पसंख्यक वर्गों की सुरक्षा और हितों को ध्यान रखते हुए उनके लिए कई घोषणाएं की और उनके हितों में कदम उठाए.

8. निशस्त्रीकरण का प्रयास

द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिका ने जापान पर परमाणु बम का प्रयोग किया था. परमाणु बम के प्रभाव से जापान में भीषण तबाही हुई. लाखों लोग अपने प्राणों से हाथ धो बैठे और लाखों घायल हुए. परमाणु बम की इस विनाश लीला को देखकर अंतरराष्ट्रीय जगत ने निशस्त्रीकरण के प्रयास करने की कोशिश की ताकि भविष्य में इस प्रकार की जान माल की क्षति न हो सके. लेकिन इस दौरान रूस एवं अमेरिका के बीच के मतभेदों के कारण निशस्त्रीकरण के प्रयास सफल ना हो पाया.

द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणाम

9. उपनिवेशन में नवजागरण

द्वितीय विश्वयुद्ध का सबसे गंभीर प्रभाव उन उपनिवेशों पर पड़ा जो पश्चिमी साम्राज्यवादी शक्तियों के प्रभाव में थे. जापान ने एशिया, एशिया वालों के लिए का नारा दिया जो कि भारत और चीन जैसे पश्चिमी और यूरोपीय उपनिवेशों के गुलाम बने हुए थे, उनके लिए यह नारा स्वतंत्रता का प्रतीक बन गया. जापान ने जिस प्रकार एशिया में कड़ाई से पश्चिमी साम्राज्यवादी ताकतों का जोरदार ढंग से विरोध किया था, उसका प्रभाव भारत और चीन जैसे देशों पर भी पड़ा और उनके प्रभाव से इन देशों में स्वतंत्रता की लड़ाई में और ही तेजी आई. जापान के द्वारा इन कदमों से वर्मा, भारत, चीन जैसे देशों में राष्ट्रीयता की भावना काफी बढ़ गई और इन देशों की जनता पश्चिमी उपनिवेशवाद की ताकतों पर जोरदार आघात करना शुरू किया, जिसके परिणामस्वरूप पश्चिमी तथा यूरोपीय उपनिवेश की शक्तियां कमजोर पड़ गए और धीरे-धीरे ये देश उपनिवेशवाद के प्रभाव से आजाद होते चले गए.

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