भारत में कुटीर उद्योग के पतन के क्या कारण थे? | कुटीर उद्योग के पतन के कारण लिखिए​

भारत में कुटीर उद्योग

मध्ययुग के अंत तक कुटीर उद्योग भारत में उन्नत अवस्था में थे. यह उद्योग न केवल भारतवासियों की आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे बल्कि  अन्य देशों को भी बनी हुई सामग्री भेजते थे. भारत में अंग्रेजों के आने से पहले शहरों में दस्तकारी का कार्य बहुत कुशलता से होता था. कला भी बहुत उच्च कोटि का था. सब जगह इन वस्तुओं की मांग और खपत होती थी.

कुटीर उद्योग के पतन के कारण

भारत में आधुनिक युग के आगमन के साथ ही प्राचीन काल से चले आ रहे इन कुटीर उद्योगों का अचानक पतन होना आरंभ हो गया.

कुटीर उद्योग के पतन के कारण

1. ब्रिटिश शासन की स्थापना

भारत में ब्रिटिश शासन के स्थापना होने के साथ ही कुटीर उद्योगों का पतन होना शुरू हो गया. दरअसल अंग्रेज नहीं चाहते थे कि भारत में इन वस्तुओं का निर्माण हो. वे चाहते थे कि भारतीय वस्तुओं का इस्तेमाल इंग्लैंड के शिल्पकारों और औद्योगिक व्यापारियों के लिए कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल हो. इसीलिए उन्होंने अपनी राजनीतिक सत्ता का इस्तेमाल इस प्रकार किया कि कच्चे माल पर उनका पूर्ण रूप से नियंत्रण बना रहे. वे नहीं चाहते थे कि भारत में किसी प्रकार का उद्योग विकसित हो. अंग्रेजों की यह नीति भारतीय कुटीर उद्योगों के लिए बहुत ही हानि कारक सिद्ध हुए. इस नीति से भारतीय कुटीर उद्योग अत्याधिक प्रभावित हुआ और धीरे-धीरे समाप्त होते चले गए. भारत में अंग्रेजों का शासन का लक्ष्य एकमात्र आर्थिक शोषण मात्र था.

कुटीर उद्योग के पतन के कारण

2. औद्योगिक क्रांति

इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति और भारत में अंग्रेजों की विजय लगभग एक ही समय हुई. इस उद्योग की क्रांति के कारण ब्रिटेन को कच्चे माल की आवश्यकता थी तथा वस्तुओं की बिक्री के लिए बाजार की भी जरूरत थी. ऐसे में ब्रिटिश शासकों ने अपनी राजनीतिक सत्ता का दुरुपयोग करके भारत के कच्चे माल को इंग्लैंड भेजना शुरू कर दिया और वहां से निर्मित वस्तुओं को वापस भारत में ही बेचना शुरू कर दिया. ब्रिटेन से आयतित वस्तु, भारतीय वस्तुओं की तुलना में काफी सस्ते और दिखने में अच्छे होते थे. इस वजह से ब्रिटेन में बनी वस्तु भारत में जल्दी ही लोकप्रिय हो गए. इसका प्रतिकूल प्रभाव भारतीय उद्योगों पर पड़ा और धीरे-धीरे उनका पतन होना शुरू हो गया. विद्युत चरखे की आविष्कार ने भारतीय कपड़ा उद्योग को नष्ट कर दिया. ऐसे स्थिति लगभग हर क्षेत्रों में हुई.

कुटीर उद्योग के पतन के कारण

3. रेलवे का विकास

रेलवे के विकास ने भारतीय उद्योगों को बहुत ही प्रभावित किया. जब रेलवे का विकास नहीं हुआ था तब इंग्लैंड के कारखानों में बनी हुई वस्तुएं भारत के सभी भागों में पहुंच नहीं पाती थी. ऐसे समय में उन व क्षेत्रों की मांग की पूर्ति भारतीय कुटीर उद्योगों से बनी हुई वस्तुओं के द्वारा ही होती थी. लेकिन रेलवे के विकास ने भारत के हर क्षेत्र पर ब्रिटिश वस्तुओं की पूर्ति को सुलभ बना दिया. इस कारण भारतीय कुटीर उद्योगों में बनी हुई वस्तुओं की मांग कम होने लगी.

4. भारतीय शासकों का पतन होना

भारत में बढ़ती अंग्रेजी साम्राज्य के कारण भारतीय शासकों का पतन होना शुरू हो गया. भारतीय शासक और उनके दरबारी भारतीय कुटीर उद्योगों के ग्राहक हुआ करते थे. लेकिन इन के पतन के बाद मांग भी बंद हो गई. ऐसे में कुटीर उद्योगों को बहुत बड़ा धक्का लगा. भारतीय शासक भारत के कुटीर उद्योगों में बनी हस्तशिल्प वस्तुओं और कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित करते और उनको संरक्षण भी प्रदान करते थे. लेकिन भारतीय राज्यों के खत्म होने पर सब कुछ अपने-आप ही खत्म होते चला गया.

कुटीर उद्योग के पतन के कारण

5. अकाल

देश में समय-समय पर अकाल पड़े. इनका असर सबसे ज्यादा कुटीर उद्योग घर पर पड़ा. अकाल के समय निर्धन कारीगर दूसरे कार्यों के द्वारा रोटी जुटाने पर विवश हो जाते थे. संकट खत्म होने के बाद बहुत से कारीगर अपने पुराने पेशे पर वापस नहीं लौट पाए और व श्रमिक ही बने रहे. इससे कुटीर उद्योगों पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ा.

6. ईस्ट इंडिया कंपनी का अत्याचार

ईस्ट इंडिया कंपनी और उसके कर्मचारियों ने 18 सदी के दौरान बंगाल के कुटीर उद्योगों के कारीगरों पर बहुत अत्याचार किए. वे उन कारीगरों को अपनी वस्तुएं बाजार कीमत से कम पर बेचने तथा अपनी सेवाओं को प्रचलित मजदूरी से कम पर देने के लिए मजबूर किया. बंगाल के 1793 के Act ने कारीगरों  की जिंदगी और उनके कार्य पर और ही ज्यादा घातक प्रभाव डाला. इस कारण हजारों कारीगरों ने अपने पुश्तैनी पेशा को छोड़ना शुरू कर दिया. विलियम बोल्ट के अनुसार जुलाहों के 700 से भी अधिक परिवारों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के दमनकारी कार्रवाहियों के कारण अपना पेशा छोड़ दिया. इसके अलावा 18 वीं और 19वीं शताब्दियों के दौरान ब्रिटेन और यूरोप में भारतीय वस्तुओं की आयात पर भारी कर और प्रतिबंध लगाए गए. इससे भारतीय कुटीर उद्योग काफी प्रभावित हुआ.

कुटीर उद्योग के पतन के कारण

मूल्यांकन

उपरोक्त कारणों के कारण भारतीय कुटीर उद्योगों का विनाश शुरू हुआ और आज यह लगभग पूरी तरह समाप्त हो गया. आज कुटीर उद्योगों की वस्तुओं के अवशेष संग्रहालयों में ही देखने को मिलते हैं. पुराने कारीगरों के वंशज अपने रोजगार को बदल लिए जिसके कारण उनकी कला आज लगभग विलुप्त हो गई.  वे आज श्रमिक मात्र रह गए. कुटीर उद्योगों के विलुप्त होने से तत्कालीन भारतीय अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई, क्योंकि उस समय भारतीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह कुटीर उद्योग और कृषि पर निर्भर थी.

कुटीर उद्योग के पतन के कारण

कुटीर उद्योग के पतन होने के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था का पूरा भार कृषि पर पड़ा. इसके बाद भारत में घोर गरीबी बढ़ती चली गई. किसी जमाने कुटीर उद्योग भारत  के लिए गौरव का विषय हुआ करता था लेकिन ये अंग्रेजों के राजनीतिक दबाव और अत्याचार सहन नहीं कर सके और इनका दुखद अंत हो गया.

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