मुगलकालीन भारत की शिक्षा प्रणाली कैसी थी? | मुगल काल के दौरान शिक्षा प्रणाली कैसी थी?

मुगलकालीन भारत की शिक्षा प्रणाली

मुगलकालीन भारत की शिक्षा प्रणाली मुख्य रूप से धार्मिक विचारों से काफी प्रभावित थी. इस शिक्षा का तत्कालीन समाज पर व्यापक रूप से पड़ा. मुगलकालीन शिक्षा के प्रमुख निम्न उद्देश्य थे:

  • प्रत्येक मुसलमान को शिक्षा प्रदान करना
  • इस्लाम का प्रचार एवं प्रसार करना भी शिक्षा का एक उद्देश्य था
  • भौतिक सुख प्राप्त करना
  • राजनीतिक उद्देश्यों को प्राप्त करना

मुगलकालीन भारत की शिक्षा प्रणाली

इस्लामी शिक्षा का मूल स्थान भारत नहीं बल्कि मध्य एशिया, अरब और ईरान थे. यहां काफी पहले ही मुस्लिम शिक्षा प्रणाली का विकास हो चुका था. इन देशों के विद्यालय इस्लाम शिक्षा के घर थे. इन का मुख्य उद्देश्य इस्लाम का प्रचार करना तथा उसे सुदृढ़ बनाना था.  इस विषय में डॉ. युसूफ हुसैन का कथन उल्लेखनीय है. उनके शब्दों में मध्य युग में सोचने का दृष्टिकोण भी मजहबी था. राजनीतिक दर्शन और शिक्षा भी मजहबी नियंत्रण में थे. यहां तक कि लोगों की सोचने और अभिव्यक्ति तक के दृष्टिकोण मजहबी थे. इस्लामी देशों के समान भारत में भी मुगल काल में शिक्षा का मूल उद्देश्य धार्मिक भावनाओं से अवगत कराना था. केवल अकबर का शासन काल ही इससे अलग था.  उसके शासनकाल में धार्मिक उदारता की परिचय स्पष्ट दृष्टिगत होता है.

प्रारंभिक शिक्षा

मुगलकाल में प्राथमिक शिक्षा का प्रमुख केंद्र विद्यालय थे.  विद्यालयों को मकतब कहा जाता था. इन मकतबों में वर्णमाला एवं धार्मिक विचारों एवं प्रार्थना का ज्ञान विद्यार्थियों प्रदान किया जाता था. जनसाधारण के बच्चे इन्हीं मकतबों में शिक्षा प्राप्त करते थे, जबकि उच्च वर्ग की एवं राज परिवार के बच्चों के लिए अलग से अध्यापकों की नियुक्ति कर शिक्षा दिलाई जाती थी. मकतबों के अतिरिक्त खानकाह और दरगाहों में शिक्षा दी जाती थी. प्रारंभिक शिक्षा बिस्मिल्लाह की रस्म से सामान्यत: 5 वर्ष की उम्र से प्रारंभ कर दी जाती थी.

उच्च शिक्षा

मुगल काल में उच्च शिक्षा के प्रमुख केंद्र मदरसे होते थे. इन मद्रास में व्याख्या व्याख्यानों के द्वारा शिक्षा प्रदान की जाती थी. मद्रास में अध्यापकों की नियुक्ति सरकार के द्वारा की जाती थी. मद्रास में प्रवेश उन्हें विद्यार्थियों को दिया जाता था. जिन्हें माता वह में शिक्षा पूर्ण कर ली हो. मद्रास के संचालन के लिए एक सीमित होती थी. एक समिति होते थे. जिसमें राज्य के संपर्क व्यक्ति होते थे. मुगल काल में उसे शिक्षा दो प्रकार के थे.

मुगलकालीन भारत की शिक्षा प्रणाली

धर्मनिरपेक्ष शिक्षा

धर्म निरपेक्ष शिक्षा के अंतर्गत अरबी, व्याकरण, साहित्य, तर्कशास्त्र, दर्शनशास्त्र, इतिहास, गणित, ज्योतिष, भूगोल, कानून, चिकित्सा शास्त्र एवं कृषि आदि होता था, इस शिक्षाओं का माध्यम अरबी भाषा था.

धार्मिक शिक्षा

धार्मिक शिक्षा के अंतर्गत धर्म एवं धार्मिक विषयों की शिक्षा प्रदान की जाती थी. इस प्रकार की शिक्षा प्रदान किए जाने का मुख्य उद्देश्य नये-नये धर्म परिवर्तित कर मुसलमान बने लोगों को धर्म से अवगत कराना था. इस कारण इस प्रकार की शिक्षा को मदरसों के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया था. अकबर ने इस व्यवस्था में परिवर्तन किया था तथा हिंदू और मुसलमान को समान रूप से शिक्षा प्रदान किए जाने की व्यवस्था की थी.

मुगलकालीन भारत की शिक्षा प्रणाली

परीक्षा पद्धति

मुगलकाल में आधुनिक युग के समान उत्कृष्ट शिक्षा व्यवस्था का अभाव था. इस कारण कोई भी नियोजित परीक्षा पद्धति नहीं थी. अध्यापक, विद्यार्थी की योग्यता को देखते हुए उसे अगले कक्षा में भेज देते थे. विद्यार्थियों को गलती करने पर दंडित किया जाता था. यद्यपि विद्यार्थी को दंड देने का कोई निश्चित कानून नहीं था. इसीलिए शिक्षक आवश्यकता अनुसार दंड देते थे. विद्यार्थियों के लिए करें अनुशासन का पालन करना आवश्यक था. जिसका उल्लंघन करने पर बेंत अथवा कोड़े लगाने अथवा मुर्गा बनने की सजा दी जाती थी. विद्यार्थियों को उत्साहित करने के लिए पुरस्कार भी दिए जाते थे. उच्च शिक्षा प्राप्त विद्यार्थियों को राज दरबार में और अन्य सरकारी कार्यों में उच्च पद प्रदान किए जाते थे. उच्च पदों के लिए चयनित विद्यार्थियों को अमामा पगड़ी के द्वारा सम्मान किया जाता था.

छात्रावास

मुगल काल में छात्रों के लिए छात्रावास की व्यवस्था थे. किंतु यह सुविधा केवल मदरसे के विद्यार्थियों के लिए ही थी. मकतबों के छात्रों के लिए नहीं. छात्रावास में सभी प्रकार की सुविधाएं थी. छात्रावासों के निर्माण और रख-रखाव के लिए सरकार के अतिरिक्त धनी व्यक्तियों से भी अनुदान लिया जाता था.

स्त्रियों की शिक्षा

मुगलकाल में स्त्रियों के लिए शिक्षा की व्यवस्था थी. लेकिन उनकी शिक्षा उतनी अच्छी नहीं थी जितने पुरुषों के लिए थी. बालकों के समान बालिकाएं मकतबों और मदरसे में शिक्षा ग्रहण के लिए नहीं जा सकती थी. बालिकाओं को मस्जिद से संलग्न मकतबों में भेज दिया जाता था. वहां उन्हें लिखने और पढ़ने की साधारण शिक्षा दी जाती थी. उचित शैक्षिक व्यवस्था न होने के कारण के बावजूद मुगल काल में कुछ स्त्रियां अत्यंत भी विदुषी थी तथा प्रशासनिक कार्य में सहायता के लिए परामर्श दिया करती थी. इन स्त्रियों में मुख्य रूप से नूरजहां, जहांआरा, ताराबाई आदी थी. साहित्यिक क्षेत्र में भी अनेक स्त्रियों का नाम लिया जा सकता था. जैसे कि रूपमति, जैबुन्निसा और गुलबदन बेगम. हुमायूं की भतीजी सलीमा सुल्ताना भी एक अत्यंत अत्यंत विदुषी महिला थी. उसने अनेक कविताओं की रचना की थी. अकबर ने स्त्रियों की शिक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया था तथा फतेहपुर सीकरी में महिला मदरसे की स्थापना की थी. शाहजहां की पुत्री जहांआरा बेगम अत्यंत विदुषी थी. उसकी कब्र पर खुदी हुई उसकी कविता उसकी बौद्धिक क्षमता की पुष्टि करती है.

मुगलकालीन भारत की शिक्षा प्रणाली

हिंदू शिक्षा

मुगलकाल तक आते-आते हिंदुओं के प्राचीन कालीन शिक्षा के प्रमुख केंद्र लगभग नष्ट हो चुके थे. तुर्कों एवं मुसलमान आक्रमणकारियों ने मंदिरों के अतिरिक्त शिक्षण संस्थान को भी क्षति पहुंचाई. मुगल काल में हिंदू शिक्षण संस्थाएं मुख्य रूप से तीन प्रकार थे- पाठशाला, विद्यालय और गुरूशालाएं. पाठशाला में पढ़ने-लिखने की साधारण शिक्षा प्रदान की जाती थी. विद्यालय उच्च शिक्षा के केंद्र होते थे. यहां संस्कृति एवं साहित्य की शिक्षा प्रदान की जाती थी. हिंदू शिक्षा का प्रमुख केंद्र बनारस, मथुरा, प्रयागराज  अयोध्या, मिथिला तथा श्रीनगर थे. बनारस में हिंदू शिक्षा और संस्कृति की खूब उन्नति हुई. भारत के विभिन्न स्थानों से शिक्षा ग्रहण करने के लिए विद्यार्थी बनारस आते थे. बंगाल का नदिया भी हिंदू शिक्षा का प्रमुख केंद्र माना जाता था.

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