मौलाना अब्दुल कादिर बदायूंनी के इतिहास लेखन का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए

मौलाना अब्दुल कादिर बदायूंनी

मौलाना अब्दुल कादिर बदायूंनी (Abdul Qadir Badayuni) फारस मूल के भारतीय इतिहासकार और अनुवादक थे. ये मुगलकालीन प्रमुख इतिहासकारों में से एक थे. मौलाना अब्दुल कादिर बदायूंनी अकबर का आलोचनात्मक इतिहासकार था. यही कारण उसने हमेशा अकबर की नीतियों को आलोचनात्मक दृष्टिकोण से देखा. उसने हमेशा अकबर के द्वारा किए गए असफल कार्यों को ही अपनी रचनाओं में अधिक महत्व दिया.

अब्दुल कादिर बदायूंनी

अब्दुल कादिर बदायूंनी (Abdul Qadir Badayuni) का जन्म 21 अगस्त 1540 ई. को टोडा स्थान पर हुआ था. उसके पिता का नाम मुलुक शाह था. बचपन में उसकी शिक्षा-दीक्षा का प्रबंध वही के स्थानीय स्कूल में हुआ. जब वह 12 वर्ष का हुआ तो उसके पिता ने उसे उच्च शिक्षा हेतु उसे संभाल ले गए. यहां से शिक्षा प्राप्त करके वह 1558-59 ई. में आगरा चला गया और वहां पर उसने शेख मुबारक नागौरी से शिक्षा लेना शुरू किया. नागौरी, अबुल फजल एवं फैजी के पिता थे. उन्हीं से अबू फजल और फैजी ने भी शिक्षा ग्रहण की थी. 1562 ई. में अब्दुल कादिर के पिता की मृत्यु हो गई. तत्पश्चात वह बदायूं चला गया और पटियाली के जागीरदार हुसैन खां के यहां नौकरी कर ली. यहां वह 9 वर्ष तक सेवा करता रहा. 1574 ई. में वह फिर से आगरा चला गया और जलाल खां कुराची और हकीम आइनुमुल्क की मदद से दरबार में पेश हुआ. उसकी धार्मिक योग्यता से प्रभावित होकर अकबर ने उसे 20 का मनसब प्रदान किया और उसे बुधवार के दिन नमाज पढ़ाने के लिए आगरा की मस्जिद में इमाम के रूप में नियुक्त किया. इस प्रकार 1576 ई. में आगरा के साथ इमाम में अब्दुल कादिर बदायूंनी को भी स्थान प्राप्त हो गया. 1579 ई. में सम्राट द्वारा उसने भरण पोषण के लिए 1000 बीघा भूमि मदद-ए-माश के रूप में बिना कर के दिया. बदायूं में निवास करने के कारण ही उसका नाम बदायूंनी पड़ गया. अब्दुल कादिर बदायूंनी बहुत ही मेधावी था. उसे अरबी, फारसी एवं संस्कृत का अच्छा ज्ञान था. वह एक अच्छा संगीतकार भी था. वह गाता भी था और बीणा भी बजाता था. अकबर बदायूंनी की प्रतिभा से काफी प्रभावित था. खगोल शास्त्र के अच्छे ज्ञान होने का वह अकबर के दरबार के विद्वानों की श्रेणी में आ गया. किंतु अबुल फजल के अकबर के दरबार में आने से अब्दुल कादिर बदायूंनी प्रतिष्ठा कम होती चली गई. 1596 ई. में अब्दुल कादिर बदायूं की मृत्यु हो गई.

अब्दुल कादिर बदायूंनी

अब्दुल कादिर बदायूंनी की रचनाएं

अब्दुल कादिर बदायूंनी की बहुत सी रचनाएं थी. इन रचनाओं में कुछ अनुवादित ग्रंथ थे तथा कुछ उनकी अपनी मौलिक रचनाएं है.

  • अनुवादित ग्रंथ: बहर-उल-असमान, तरजुमा-ए-महाभारत, तरजुमा-ए-रामायण, तरजुमा-ए-सिंहासन बत्तीसी
  • मौलिख ग्रंथ: किताबुल अहादिस, तारीख-ए-अल्फी, नजात-उल-रशीद, मुन्तखब-उत-तवारीख

बदायूंनी की लेखन परीक्षण

बदायूं के अनुसार इतिहास एक उच्च विज्ञान है और शिक्षा की एक उच्च शाखा है क्योंकि इतिहास हमें शिक्षा देता और हम अनुभव लोगों के अनुभवों से सीखते हैं. मुन्तखब उत तवारीख में अब्दुल कादिर बदायूंनी लिखता है कि इतिहास लेखन का मेरा उद्देश्य वास्तविक इतिहास लिखना है, किंतु ऐसा करने मेरी लेखनी फिसल जाए अथवा मेरे विचार जो लिखने को गति प्रदान करते हैं, वह किसी अन्य बात से अन्यथा प्रभावित हो जाए और मैं गलती कर जाऊं तो मुझे इस बात की आशा है कि अल्लाह ताला मुझे माफी प्रदान करेगा. इस प्रकार बदायूंनी इतिहास लेखन को अपना कर्तव्य मानता है तथा वस्तुनिष्ठ इतिहास लेखन पर बल देता है, लेकिन जो इतिहास में उपलब्ध है उसमें ऐसा संभव नहीं हो पाया और बदायूं ने अपने मूल दायित्व का निर्वहन नहीं कर पाया है तथा वह अपने व्यक्तिगत विचारों से प्रभावित होकर अकबर की यथासंभव आलोचना में ही लग जाता है तथा उसका इतिहास व्यक्तिपरक बन जाता है.

अब्दुल कादिर बदायूंनी

बदायूंनी द्वारा अकबर के अत्यंत आलोचना के प्रमुख कारण:

  • अब्दुल कादिर बदायूंनी कट्टर सुन्नी था. उसका पालन-पोषण वैसे परिवार में हुआ था जो कि कट्टरपंथी भावनाओं से प्रभावित था. इस कारण वह अकबर के उदारवाद विचारों से सहमत नहीं था क्योंकि अकबर ने विभिन्न धर्मालम्बियों को अपने दरबार में रखा था. यही कारण अब्दुल कादिर बदायूंनी अकबर से नाराज रहता था. उसका विचार था कि जो कट्टर मुसलमान है, केवल उन्हीं को दरबार में जगह देना चाहिए.
  • अकबर ने अब्दुल कादिर बदायूं को 20 का मनसब प्रदान किया था तथा बुधवार के दिन नमाज पढ़ने के लिए इमाम भी नियुक्त किया था, किंतु अपनी प्रतिभा का उसे पूर्ण पारिश्रमिक नहीं प्राप्त हो सका. अबुल फजल को भी प्रारंभ में 20 का मनसब प्राप्त था लेकिन उसने पदोन्नति करते-करते 5000 का मनसब प्राप्त कर लिया था. मनसब में बढ़ोतरी न होने के कारण अब्दुल कादिर बहुत ही दुखी रहता था तथा इसी कारण वह अकबर तथा अबुल फजल को कभी भी माफ नहीं कर सका.
  • बदायूं के पुत्र का नाम सम्राट अकबर ने ही अब्दुल हादी रखा था, परंतु उसकी 6 महीने में ही मृत्यु हो गई. बदायूं ने उसके मरने का कारण अकबर के नामकरण को ही माना.

बदायूंनी एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था. अतः शिया मुसलमानों से भी घृणा करता था. हुमायूं के शासनकाल में शिया और सुन्नी के बीच में जो मतभेद थे, उनका वह उल्लेख करता था और हिंदुओं को काफिर मानते हुए उनके विरुद्ध जिहाद करने की बात करता था. महाराणा प्रताप के विरुद्ध हल्दीघाटी के युद्ध में वह काफिरों के विरुद्ध जिहाद करने के लिए शामिल हुआ था ताकि वह अपनी सफेद दाढ़ी को काफिरों के खून से लाल कर सके. उसने अकबर के द्वारा प्रतिपादित दीन-ए-इलाही की निंदा की है तथा अकबर के ऊपर आरोप लगाया है कि वह एक दिनार मुसलमान नहीं रह गया था और उस पर गैर इस्लामिक प्रभाव छा गया. अकबर ने ईसाईयों को भी चर्च बनाने की अनुमति दी थी तथा वह खुद मरियम का चित्र भी रखता था. इसी कारण अब्दुल कादिर बदायूंनी ने लिखा है कि वह शीघ्र ईसाई बनने वाला था.

अब्दुल कादिर बदायूंनी

यद्यपि बदायूंनी ने इस बात का दावा किया कि उसने जो कुछ लिखा है, वह सही है. किंतु उसके कथन और उनके लेखन में विरोधाभास साफ़ दिखाई देता है. वह अपने कर्तव्यों के विपरीत चल गया था. वह एक सत्यनिष्ठ इतिहास लेखन के केवल डोंग करता था.

इतनी कमियों के बावजूद भी बदायूंनी की रचनाओं को महत्वहीन नहीं कहा जा सकता है. मुन्तखब-उत-तवारीख अफगान इतिहास की जानकारी तबकात-ए-अकबरी से अत्यधिक विस्तृत दिखती है. वह अकबरनामा की झूठी आयुक्तियों को काटकर सुधार देता है. डॉ. एम. ए. रिजवी लिखते हैं कि बदायूंनी की इतिहास को उसके विशेष धार्मिक दृष्टिकोण के कारण बड़ा महत्व प्राप्त है. उसने मोहम्मद बिन तुगलक के राज्य काल की बहुत सी घटनाओं के समय निर्धारित किया है. यद्यपि उसमें बहुत सी तारीखों को स्वीकार करना कठिन है फिर भी उसके विवरण का महत्व घटाया नहीं जा सकता मार्शल के अनुसार मुन्तखब-उत-तवारीख एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें उस काल के पूर्ण चित्रण मिल जाता है. उसके अनुसार अकबर के शासनकाल के लिए यह ग्रन्थ विशेष लाभदायक है क्योंकि यह अनेक तत्वों को सही तरीके से उजागर कर देता है जो अकबरनामा में प्रशंसा के तौर पर भर दिए गए हैं. इस प्रकार अकबर का सही मूल्यांकन में यह पुस्तक अत्यंत सहायक है.

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