स्टालिन की विदेश नीति का वर्णन कीजिए

स्टालिन की विदेश नीति

1917 ई. में रूस में क्रांति हुई. इस क्रांति के परिणामस्वरुप रूस से जारशाही तानाशाही शासन व्यवस्था का अंत हुआ और बोल्शेविक सरकार की स्थापना हुई. इस सरकार के द्वारा रूस में साम्यवादी शासन व्यवस्था को लागू किया गया. यह घटना यूरोप के अन्य देशों के लिए चौकाने वाली थी क्योंकि इस समय अधिकांश देश पूंजीवादी थे तथा उन देशों में प्रजातांत्रिक अथवा राजतंत्र आत्मक शासन व्यवस्था थी. रूस के क्रांतिकारियों को यह विश्वास था कि उनकी क्रांति का प्रभाव विश्व के अन्य देशों पर पड़ेगा और वहां भी क्रांतियां होगी. लेनिन ने भी इसी प्रकार का विचार व्यक्त करते हुए कहा था हम सभी देशों से शांति का आह्वान करेंगे और सभी उपनिवेशों एवं अधीन राज्यों को स्वतंत्र किए जाने की मांग करेंगे. जर्मनी, इंग्लैंड और फ्रांस की सरकारें इन मांगों को स्वीकार नहीं करेगी. अतः हमें संघर्ष के लिए तैयार रहना पड़ेगा. हम एशिया के उपनिवेशों एवं अधीनस्थ देशों की पीड़ित एवं शोषित जनता को विद्रोह करने के लिए सुनियोजित ढंग से प्रेरित करेंगे. हम समाजवादी सर्वहारा वर्ग को भी अपनी-अपनी सरकारों के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए प्रेरित करेंगे.

स्टालिन की विदेश नीति

पूंजीवादी देशों में इस प्रकार की रूसी नीति का घोर विरोध किया गया और परिणामस्वरूप यूरोप में फासीवाद और नाजीवाद का जन्म हुआ. यूरोपीय देशों का विचार था कि साम्यवाद का जवाब फासीवाद और नाजीवाद ही हो सकता है. पूंजीवादी देशों ने रूस में साम्यवाद एवं साम्यवादी विचारधाराओं को फैलने से रोकने के लिए यथासंभव प्रयास किया. इस परिस्थिति में रूस के लिए किसी भी देश से संबंध बनाना कठिन था. 1917 ई. से 1945 ई. के बीच रूस को बहुत से कठिनाईयों से होकर गुजरना पड़ा. इस दौरान रूस में बहुत सी विदेश नीतियों को बनाया और बदला गया.

रूस की विदेश नीति को अध्ययन की सुविधा के लिए इन्हें कई भागों में बांटा गया है:

1. रूसी विदेश नीति (1917 ई.- 1921 ई.)

1917 ई. के बाद रूस की विदेश नीति के दो प्रमुख उद्देश्य थे- पहला साम्यवादी क्रांति को विश्वव्यापी रूप से बनाना तथा दूसरा पश्चिमी देशों के द्वारा किए रहे साम्यवाद के विरोध का सामना करना. इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए रूस ने अनेक प्रयास किए. लेनिन का विचार था कि क्रांति, साम्यवाद की सफलता का प्रथम चरण था और यह क्रांति शीघ्र अन्य देशों में भी फैलेगी. लेनिन ने कहा था यूरोप में एक समाजवादी क्रांति होगी और यह भविष्यवाणी है. इस भविष्यवाणी को साकार करने के लिए साम्यवादियों ने विश्व के लोगों को आह्वान किया कि विश्व के मजदूर एक हो जाओ. तुम्हें अपने बंधनों के अतिरिक्त कुछ नहीं खोना है. इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए मार्च 1918 ई. में मास्को में तृतीय साम्यवाद अंतरराष्ट्रीय संगठन (कामिन्टर्न) की स्थापना की गई. इसका मुख्य उद्देश्य विश्व क्रांति की योजना बनाना, पूंजीवादी देशों में साम्यवादी साहित्य भेजना, कृषकों और मजदूरों को क्रांति के लिए प्रेरित करना आदि था. इस कारण पूंजीवादी राष्ट्र इस संगठन पर विशेष नजर रखने लगे. इस संगठन का महत्व पर प्रकाश डालते हुए वानलाव ने लिखा है कि इस संगठन की स्थापना के बाद क्रांतिकारी आंदोलन सोवियत संघ के वैश्विक संबंधों का एक स्थायी तत्व बन गया था.

रूस के इस संगठन के प्रयासों के परिणामस्वरुप अनेक देशों में क्रांतियां और विद्रोह हुए. 1919 ई. में हंगरी में साम्यवादी शासन की स्थापना हुई, लेकिन पूंजीवादी राष्ट्रों ने इसे असफल कर दिया. 1919 ई. में बवेरिया में विद्रोह हुआ.  1920 ई. में इटली के विभिन्न भागों में भी साम्यवादी आंदोलन हुए. इसके अलावा इस संगठन के द्वारा अनेक देशों में साम्यवादी आंदोलन करने के प्रयास किए गए, किंतु एक सफल नहीं हो पाए.

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3 मार्च 1918 ई. को रूस ने जर्मनी के साथ ब्रेस्ट लिटोवस्क की संधि की. इससे मित्र राष्ट्र रूस से नाराज हो गए क्योंकि उन्होंने इसे उन्हें हराने के लिए उठाया हुआ एक कदम समझा. रूस की सरकार ने जार द्वारा पश्चिमी देशों से लिए गए ऋण को भी लौटने से इनकार कर दिया. इससे भी रूस और पश्चिमी देशों के संबंध 1917 ई. से 1921 ई. के बीच अत्यंत कटुतापूर्ण रहा.

2. रूसी विदेश नीति (1921 ई. – 1934 ई.)

रूसी विदेश नीति में इस दौरान कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए. रूस अपनी आंतरिक स्थिति और दयनीय आर्थिक स्थिति के कारण इस बात के लिए विवश हुआ कि वह अपने नीति में परिवर्तन करे. शूमां ने लिखा है कि 1921 ई. का वर्ष सोवियत रूस के आंतरिक एवं बाह्य नीति में एक आश्चर्यजनक परिवर्तन का समय था. रूस की वैदेशिक नीति का इस समय तीन उद्देश्य थे – जर्मनी को पश्चिमी देशों के गुट में न जाने देना, पश्चिमी देशों से कूटनीति संबंध स्थापित करना तथा पश्चिमी देशों के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित करके अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारना.

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अपनी इस नीति के अंतर्गत रूस ने अन्य देशों के साथ मित्रता पूर्ण संबंध स्थापित करने का प्रयास किया. किंतु पश्चिमी देश इसके लिए कोई उत्सुकता नहीं दिखाई. रूस के विदेश मंत्री चिचेरिन के प्रयत्नों से जिनेवा में होने वाले सम्मेलन में रूस आमंत्रित किया गया. रूस ने इस सम्मेलन में पश्चिमी देशों के साथ संबंध स्थापित करने का प्रयास किया, किंतु वह अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सका.

अप्रैल 1922 ई. में हुए जेनेवा के सम्मेलन में रूस को अनेक लाभ हुए. इस सम्मेलन में रूस और इटली के मध्य एक व्यापारिक संबंध स्थापित हो गई. इससे अधिक महत्वपूर्ण जर्मनी के साथ 16 अप्रैल 1922 ई. को रैपेलो की संधि थी. इस सम्मेलन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए हार्डी लिखा है कि इस सम्मेलन का एकमात्र मूर्त परिणाम रूस और जर्मनी के बीच रैपेलो का संधि होना था. इस संधि ने अन्य देशों के संशय और अविश्वास को और बढ़ा दिया. रैपेलो की संधि के द्वारा जर्मनी ने रूस को मान्यता प्रदान की और दोनों के मध्य व्यापारिक संबंध स्थापित हुए. इस प्रकार इस संधि से रूस को बहुत लाभ हुआ. लैंगसम ने इस संधि के महत्व के विषय में लिखा है कि इस संधि ने रूस की लंदन और पेरिस पर निर्भरता को कम कर दिया. रैपेडलो की संधि ने दोनों देशों को 10 वर्षों से भी अधिक समय के लिए मित्र बनाए रखा.

इसके अतिरिक्त रूस ने अनेक देशों के साथ भी संधि की. 1922 ई. में तुर्की, 1926 ई. में जर्मनी और लिथुआनिया, 1927 ई. में ईरान, पोलैंड, लाटविया और 1932 ई. में इस्टानियां के साथ संधि की. इस प्रकार इंग्लैंड, फ्रांस और इटली के द्वारा रूस को मान्यता प्रदान कर दी गई. इस दौरान रूस, पश्चिमी देशों के साथ भी संबंध स्थापत करने का प्रयत्न कर रहा था, किंतु कामिन्टर्न के गतिविधियें के कारण वह असफल रहा. इस विषय में शूमां का कथन उल्लेखनीय है कि सोवियत रूस राजनीतिज्ञ सहयोग की बात करते हैं लेकिन कामिन्टर्न हमेशा क्रांति का उपदेश देता था.

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3. रूसी विदेश नीति (1934 ई.-1938 ई.)

इस काल में यूरोप में कुछ ऐसी घटनाएं हुई जिन्होंने रूसी विदेश नीति को व्यापक रूप से प्रभावित किया. इस काल में जर्मनी में हिटलर का उदय हुआ जो कि साम्यवाद का घोर दुश्मन था और वह साम्यवाद को जड़ से समाप्त करना चाहता था. हिटलर के अभ्युदय ने रूस के लिए घोर संकट उत्पन्न कर दिया क्योंकि पश्चिमी राष्ट्र पहले से ही उसके विरोधी थे. अत: उसके लिए आवश्यक हो गया कि वह अपनी सुरक्षा के लिए पश्चिमी राष्ट्रों से मित्रता करें. इस विषय में शूमां ने लिखा है कि फासीवाद के कारण रूस का समाजवादी और उदारवादी राष्ट्रों के साथ सहयोग अनिवार्य हो गया. अतः रूस ने पोलैंड, ईरान, लाटविया अफगानिस्तान आदि देशों के साथ समझौते किए. रूस ने राष्ट्र संघ की सदस्यता भी ग्रहण कर लिया और इसका घोर समर्थक बन गया. 1932 ई. में रूस ने फ्रांस के साथ परस्पर सहयोग की संधि की. फ्रांस भी जर्मनी की बढ़ती शक्ति से भयभीत था. अतः वह भी इस संधि के लिए तैयार हो गया. इसी वर्ष रूस ने चेकोस्लोवाकिया से भी संधि की. रूस की इस नीति को फासिस्टवादी शक्तियों ने गंभीरता से लिया और उन्होंने साम्यवाद के विरुद्ध का एंटी कामिन्टर्न समझौता किया.

 

इस प्रकार 1934 ई. से 1938 ई. के मध्य यद्यपि रूस ने पश्चिमी देशों के साथ सहयोग की नीति अपनाई किंतु व्यावहारिक रूप से मित्रता नहीं हो सका. पश्चिमी देश फासिस्टवाद और साम्यवाद में परस्पर संघर्ष करना चाहते थे. इस कारण 1938 ई. के म्यूनिख सम्मेलन में इंग्लैंड, फ्रांस, इटली और जर्मनी ने चेकोस्लोवाकिया का विभाजन कर दिया तथा रूस को इस सम्मेलन में आमंत्रित भी नहीं किया गया. रूस के लिए घटना अत्यंत चिंता का विषय बन गया और उसे इंग्लैंड और फ्रांस पर विश्वास नहीं रहा.

4. रूसी विदेश नीति (1934 ई. – 1939 ई.)

म्यूनिख समझौते के कारण रूस की स्थिति अत्यंत चिंताजनक हो गई. इस समझौता ने उसे फिर से  मित्र विहीन कर दिया. यूरोप में युद्ध की आशंका लगातार बढ़ती जा रही थी. रूस स्वयं को युद्ध से अलग रखना चाहता था. रूस को इस बात का स्पष्ट एहसास हो गया कि युद्ध से बचने का एकमात्र उपाय जर्मनी से संधि करना था. अतः उसने इस दिशा में प्रयत्न करने शुरू कर दिए और अंततः अगस्त 1939 ई. में उसने जर्मनी से अनाक्रमण संधि कर ली.

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5. रूस की विदेश नीति (1939 ई. – 1941 ई.)

इस समय रूस और जर्मनी के मध्य हुई इस संधि ने पश्चिमी देशों को चिंतित कर दिया. रूस और जर्मनी के मध्य हुई यह संधि हिटलर की एक महान उपलब्धि थी. इस संधि होते ही जर्मनी ने पोलैंड पर आक्रमण कर दिया. इस प्रकार द्वितीय विश्व युद्ध आरंभ हो गया. रूस ने प्रारंभ में इस युद्ध में भाग नहीं लिया और अपनी शक्ति की वृद्धि करने में लगा रहा. जर्मनी के सेना के पोलैंड में प्रवेश करने के बाद रूस ने भी पूर्वी पोलैंड पर अधिकार कर लिया. इसके बाद रूस ने एस्टोनिया, लातविया तथा लिथुआनिया पर जुलाई 1940 ई. को अधिकार कर लिया. इसके बाद रूस ने फिनलैंड के भी अनेक भागों पर अधिकार कर लिया. तत्पश्चात रूस ने रोमानिया के कुछ भूभाग पर भी अधिकार कर लिया. इस प्रकार इस अवधि में रूस ने अपनी सीमाओं को सुरक्षित किया. इधर रूस की बढ़ती शक्ति ने हिटलर को चिंता में डाल दिया और वह रूस की बढ़ती शक्ति को दबाने के लिए रूस पर आक्रमण करने की योजना बनाने लगा. इसके अलावा उनकी योजना उन स्थानों पर अधिकार किया जा सके जहां तेल और अनाज के भंडार थे. जापान ने इस बात पर जर्मनी का विरोध किया और उसने रूस के साथ अप्रैल 1914 ई. में अनाक्रमण की संधि कर ली.

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6. रूस की विदेश नीति (1941 ई. – 1945 ई.)

22 जून 1941 ई. को जर्मनी ने रूस पर आक्रमण कर दिया. इस आक्रमण के कारण रूस ने पुनः पश्चिमी देशों से मित्रता का हाथ बढ़ाया. रूस इस समय तक काफी शक्तिशाली हो चुका था और मित्र राष्ट्रों को भी जर्मनी के विरुद्ध सहायता की आवश्यकता थी. 1941 ई. में इंग्लैंड ने रूस की विशेष सहायता नहीं की. लेकिन फिर भी रूस ने जर्मनी के को सफल होने नहीं दिया और अंतः जर्मनी की पराजय हुई.

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