1857 ई. के विद्रोह के कारणों का वर्णन कीजिए

1857 ई. के विद्रोह

एंग्लो-इंडियन इतिहासकारों ने सैनिक असंतोषों तथा चर्बी वाले कारतूसों को ही 1857 ई. के विद्रोह का सबसे प्रमुख और महत्वपूर्ण कारण बताया था. लेकिन आधुनिक भारतीय इतिहासकाों ने अपने शोध से यह सिद्ध कर दिया कि चर्बी वाले कारतूस ही इस विद्रोह का एकमात्र कारण नहीं था. बल्कि उनके कई अन्य और भी कारण थे. चर्बी वाले कारतूस और सैनिकों का विद्रोह तो केवल एक चिंगारी भर थी जिसने समस्या रूपी विस्फोटक पदार्थों को जो राजनीतिक, सामाजिक  धार्मिक और आर्थिक कर्म से एकत्रित हुए थे, उसमें आग लगा दी और एक विद्रोह का रूप धारण कर लिया.

1857 के विद्रोह के कारणों

1857 के विद्रोह के कारण

राजनीतिक कारण

कंपनी ने धीरे-धीरे भारतीय रियासतों पर नियंत्रण करना आरंभ कर दिया. लार्ड वेलेजली के अधीन सहायक संधि की प्रणाली की नीति ने सभी राजाओं के मन में भय भर कर दिया. अंग्रेजों ने हिंदू राजाओं के दशक पुत्र लेने का अधिकार भी छीन लिया. इसके करण उनके उत्तराधिकारियों को उनके राज्य पर कोई अधिकार नहीं रहा. कंपनी की विलय की नीति के तहत पंजाब, पीगू और सिक्किम को अपने अधिकार में ले लिए. विजय के अधिकार अंग्रेजों ने सतारा, जैतपुर, संभलपुर, बघाट, ऊदेपुर, झांसी और नागपुर को भी अपने में विलय कर लिया. अवध को शासन के हित में विलय कर दिया गया. तंजोर और कर्नाटक के नवाबों की राजकीय उपाधियां समाप्त कर दी गई. इन सब को देखकर भारतीय राजाओं के मन में यह स्पष्ट हो गया कि अब सभी भारतीय रियासतों का अस्तित्व खतरे में है.

मुस्लिम शासकों का अस्तित्व भी खतरे में था. लॉर्ड डलहौजी जो कि साम्राज्य को जीवित रखने में पक्षधर नहीं थे, वे शहजादा फकीरूद्दीन के उत्तराधिकार को मानता तो दे दी, परंतु उस पर बहुत से प्रतिबंध लगा दिए. 1856 ई. में फकीरूद्दीन की मृत्यु के पश्चात लॉर्ड कैनिंग ने घोषणा की कि फकीरूद्दीन द्वारा नियुक्त किए गए उत्तराधिकारी शहजादे को राजकीय उपाधि और मुगल महल दोनों ही छोड़ देने होंगे. इस घोषणा से मुस्लिम बहुत चिंतित हो गए. उन्हें लगता था कि अंग्रेज तैमूर के वंश को नीचा दिखाना चाहते हैं.

1857 के विद्रोह के कारण

इस विद्रोह का एक और राजनीति कारण भारत में ब्रिटिश शासन का स्वरूप अनुपस्थित प्रभुसत्ता के रूप में होना था. इसका भारतीयों के मन में बहुत प्रभाव पड़ा. अंग्रेजों के विषय में भारतीय अनुभव करते रहे कि वे इन पर हजारों मीलों की दूरी से उनपर शासन कर रहे हैं और देश के धन का धीरे-धीरे निकास होता जा रहा है. इसके अलावा अंग्रेजी राज्य के द्वारा स्थापित नीतियों के कारण अन्य अनियमित सैनिक जो विभिन्न भारतीय रियासतों की सेना के अंग होते थे, वे सब समाप्त हो चुके थे और उन दलों से नियुक्त सैनिक अब इस विद्रोह में सम्मिलित हो गए. इससे विद्रोहियों की संख्या में वृद्धि हो गई.

प्रशासनिक और आर्थिक कारण

भारतीय रियासतों के विलय के बहुत से सामाजिक और आर्थिक प्रभाव हुए. भारतीय अभिजात वर्ग शक्ति और पदवी से वंचित हो गए. नवीन प्रशासनिक व्यवस्था में उनके लिए सम्मान प्राप्त करने का अवसर बहुत कम थे क्योंकि इस व्यवस्था में ऊंचे-ऊंचे पद केवल अंग्रेजों के लिए सुरक्षित होते थे. सेवा में ऊंचे से ऊंचा पद जो किसी भारतीय को मिल सकता था,  वह सूबेदार का पद था जिसमें केवल 60-70 रुपए मासिक वेतन मिलता था. असैनिक प्रशासन में सदर अमीन का पद था, जिसका वेतन ₹500 मासिक था. भारतीयों के लिए पद वृद्धि के अवसर बहुत कम थे. इससे भारतीयों के मन में यह अवधारणा बन गई कि अंग्रेज उन्हें लकड़हारे अथवा पानी ढोनेवाला बनाना चाहते थे. इस विषय पर सर थॉमस मुनरो ने 1817 ई. में लिखा है कि विदेशी विजेताओं ने भारतीयों पर बहुत अत्याचार किए हैं परंतु उन में से किसी ने भी उन्हें इतना हेय नहीं माना जितना हम मानते हैं.

ईस्ट इंडिया कंपनी की प्रशासनिक कार्य प्रणाली अयोग्य और अपर्याप्त थी. भूमिकर व्यवस्था तो बहुत ही अप्रिय थी. कृषक इन अव्यवस्थाओं से तंग आकर हमेशा विद्रोह करते रहते थे. हालत ये थी कि भूमिकर एकत्रित करने के लिए सेना भेजनी पड़ती थी. हालात का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पानीपत के जिले में पुलिस कार्य के लिए तो केवल 22 घुड़सवार थे परंतु भूमि के एकत्रित करने के लिए 136 व्यक्ति कार्य करते थे.

1857 के विद्रोह के कारण

बहुत से तालुकदार और वंशानुगत भूमिपति अपने-अपने पदों और अधिकारों से वंचित कर लिए गए. कुछ मुक्त भूमिपतियों को कहा गया कि वे अपने अधिकार अर्थात दस्तावेज दिखाएं जिसके द्वारा उन्हें कर मुक्त किया गया था. यह प्राय: संभव नहीं था और इसके फलस्वरूप उनकी बहुत सी भूमि जब्त कर ली गई. ऐसी भूमि नीलाम कर दी जाती थी. कई बार यह भूमि ऐसे लोग ले लेते थे जिन्हें जमींदारी का कार्य लेश मात्र भी नहीं समझते थे. ऐसे लोग कृषकों का शोषण करते थे. जैक्सन की यह नीति के तहत अवध के तालुकदारों की भूमि जब्त कर ली गई तथा स्थानीय सैनिकों के छटनी कर दी गई. बाद में यही सैनिक और तालुकदार इस प्रदेश में विद्रोह के केंद्र बने. मुंबई के प्रसिद्ध इनाम कमीशन ने 20,000 जागीरें जब्त कर ली गई. इस प्रकार बहुत से भूमिपति निधन बन गए. दूसरी ओर कृषक भी करों के भार से दबे रहे. इस कारण ये धीरे-धीरे साहूकारों के चंगुल में फंस गए. अशोक मेहता ने लिखा है कि अवध के विलय के समय में 25,545 ग्राम तालुकदारों की जागीर में थे. उनमें से 13,640 तो तालुकदारों के पास रहे. शेष 11,903 गांव उन लोगों को मिल गए जो तालुकदार नहीं थे. अर्थात् तालुकदारों के लगभग आधे-आधे गांव छीन लिए गए. कुछ तो अपना सबकुछ खो बैठे. इस व्यवस्था का यह परिणाम हुआ कि झांसी के लक्ष्मी मंदिर के कर मुक्त ग्राम भी जब्त कर लिए गए.

अंग्रेजों की आर्थिक नीतियों ने भी भारतीय व्यापार और उद्योगों पर बहुत ही बुरा प्रभाव डाला. ईस्ट इंडिया कंपनी के राजनीतिक शक्ति का प्रयोग से भारतीय हस्तशिल्प और व्यापार का ख़ात्मा हो गया.  कार्ल मार्क्स ने 1853 ई में लिखा था कि अंग्रेजी घुसपैठियों ने भारतीय खड्डी को तोड़ दिया और चरखे का सर्वनाश कर दिया. अंग्रेजों ने भारतीय सूती मंडियों का भी नाश कर दिया. सूती कपड़ा उद्योग के नाश होने से कृषि पर बोझ बढ़ गया.

सामाजिक और धार्मिक कारण

अंग्रेज भारतीय लोगों के प्रति बड़े क्रूर तथा कठोर थे. इसके अतिरिक्त जाति भेद की भावना से भी प्रेरित थे. इसीलिए वे भारतीयों को हेय की दृष्टि से देखते थे और हिंदुओं को बर्बर और मुसलमानों को कट्टरपंथी, निर्दयी और बेईमान समझते थे. यूरोपीय अधिकारी वर्ग भारतीयों के प्रति बहुत कठोर तथा असहनशील थे. वे भारतीयों को काले और सूअर की संज्ञा देते थे. वे भारतीयों का अपमान करने से कभी नहीं चूकते थे. यूरोपीयन जूरियां भी न्यायिक मामलों में भेदभाव करती थी. वे गंभीर अपराधिक मामलों पर भी इन लोगों को थोड़ा-बहुत दंड देकर छोड़ देती थी. ये बात भारतीयों को यह बहुत चुभता था.

1857 के विद्रोह के कारण

शारीरिक तथा राजनीतिक अन्याय सहन करना तो कई बार संभव हो सकता था परंतु धार्मिक उत्पीड़न सहन बहुत कठिन होता था. अंग्रेजों का एक और उद्देश्य भारतीय इसाई बनना भी था. यह कंपनी का अध्यक्ष श्री मैंगल्स के द्वारा हाउस ऑफ़ कॉमंस में दिए गए भाषण से स्पष्ट होता है. उसमें कहा गया कि दैव योग से भारत का विस्तृत साम्राज्य ब्रिटेन को इसीलिए मिला था ताकि वे ईसाई धर्म का पताका भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक पहरा सके. प्रत्येक भारतीय को अति शीघ्र ईसाई बनाने के महान कार्य को पूरा करने के लिए अपनी पूरी समझ और शक्ति लगा देनी चाहिए. मेजर एडवर्ड ने भी स्पष्ट रूप से कहा था कि भारत पर हमारे अधिकार का अंतिम उद्देश्य भारत देश को ईसाई देश बनाना है. वे सैनिकों को ईसाई बनाने के प्रेरणा देते थे. सैनिकों को यदि वे ईसाई धर्म अपना ले तो पदोन्नति का वचन दिया जाता था. ईसाई धर्म प्रचार करने वालों को पर्याप्त सुविधाएं दी जाती थी.

1850 ई. में पारित धार्मिक अयोग्यता अधिनियम द्वारा हिंदू रीति रिवाज में परिवर्तन लाया गया. अर्थात धार्मिक परिवर्तन से पुत्र को पिता की संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता था. इस कानून का मुख्य लाभ ईसाई बनने वालों को था. लोगों में यह भी अफवाह भी फैला कि लॉर्ड कैनिंग को विशेष आज्ञा दी गई कि वह भारत को ईसाई देश बना दे. राष्ट्रीय विद्या की सैद्धांतिक प्रणाली के अनुसार धार्मिक पुस्तकें पाठशालाओं में अकस्मात् ही पहुँच गई. इससे भारतीयों को यह विश्वास होता जा रहा था कि अंग्रेज उन्हें ईसाई बनाने की योजना बना रहे हैं.

सैनिक कारण

लॉर्ड ऑकलैंड के अफगान युद्ध के पश्चात अंग्रेजों के सैन्य अनुशासन को बहुत धक्का पहुंचा था. लॉर्ड डलहौजी ने गृह अधिकारियों को लिखा कि सेना का अनुशासन उच्च से निम्न अधिकारियों तक निंदनीय हो गया. बंगाल सेना में एक महान भाईचारा था. इसमें सभी सदस्य एकता से कार्य करते थे. इस सेना में सैन्य सेवा वंशानुगत थी। बंगाल सेना का 60% भाग अवध तथा उत्तर पश्चिमी प्रांतों से आता था. उसमें अधिकतर ऊंची जाति के ब्राह्मण तथा राजपूत कुलों के सदस्य होते थे. वे ये बात को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे कि उन्हें और निम्न जातीय सैनिकों को समान माना जाए. चार्ल्स नेपियर को इन उच्च जाति के भाड़े के सैनिकों पर कोई विश्वास नहीं था. लॉर्ड डलहौजी के गवर्नर जनरल होने के समय इनके द्वारा तीन सैनिक विद्रोह (1849 में 22 में एन आई का विद्रोह, 1850 में 66 में एन आई का विद्रोह और 1852 ई में 1838 में एन आई का विद्रोह) हो चुके थे.

1857 के विद्रोह के कारण

बंगाल सेना के सैनिक अवध के समस्त सैनिक जनता की भावनाओं को प्रकट करते थे. मौलाना आजाद के अनुसार अवैध के विलय ने बंगाल की सेना में विद्रोही भावना भरना प्रारंभ कर दिया. उन्होंने यह अनुभव किया कि वे जिस कंपनी के लिए सेवा कर रहे हैं, वही आज उनके राजा को समाप्त करने की कोशिश रही है. भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के प्रसार में सैनिकों की सेवा शर्तों के प्रतिकूल प्रभाव हुआ. अब उन्हें अपने देश से दूर रहकर अपनी सेवा देनी पड़ती थी। इसके लिए उनको अतिरिक्त भत्ता भी नहीं मिलता था। सैनिक उन दिनों को स्मरण करते थे जब भारतीय राजा उनकी सेवाओं से प्रसन्न होकर उन्हें जागीरें और पुरस्कार देते थे. अब अंग्रेजों की सिंध और पंजाब विजय से उनकी स्थिति और बिगड़ गई थी. 1824 ई. में बैरकपुर में सैनिकों ने समुद्र पार वर्मा में सेवा करने से मना ही कर दी थी. इसके फलस्वरुप सेना की 47 वीं रेजीमेंट भंग कर दी गई थी. 1844 ई. में चार बंगाल रेजीमेंटों ने अतिरिक्त भत्ता न मिलने के कारण सिंध जाने से मना कर दी थी.

1856 ई. में कैनिंग की सरकार ने सामान्य सेना भारती अधिनियम पारित कर दिया. इस अधिनियम के अनुसार बंगाल सेना के सभी भावी सैनिकों को यह स्वीकार करना होता था कि जहां कहीं भी सरकार को आवश्यकता होगी, वे वहीं कार्य करेंगे. इस अधिनियम के प्रभाव पुराने सैनिकों पर नहीं था. जिन सैनिकों को विदेश सेवा के लिए अनुपयुक्त घोषित कर दिया गया था, उन्हें पेंशन सहित निवृत होने की आज्ञा नहीं थी, अपितु उन्हें छावनियों में नियुक्त कर दिया जाता था.

1857 के विद्रोह के कारण

सन 1854 ई. में डाकघर अधिनियम के पारित होने पर सैनिकों के लिए निशुल्क डाक सुविधा समाप्त कर दिए गए. इसके अतिरिक्त यूरोपीय और भारतीय सैनिकों की अनुपात में अंतर दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था. 1856 ई. में भारतीय सेना में 2,38,000 भारतीय सैनिक और 45,322 यूरोपीय सैनिक थे. सेना में कुशल अधिकारियों के अभाव के कारण यह असमानता और भी गंभीर हो गई क्योंकि बहुत से सैनिक अधिकारी नव विकसित प्रदेशों में प्रशासनिक कार्य में लगे हुए थे. सैनिकों का वितरण भी काफी दोष पूर्ण था. इसके अतिरिक्त क्रीमिया युद्ध में हुए विनाश के कारण सैनिकों का मानसिक बल भी कम हो गया था. इन सब कारणों को देखकर भारतीय सैनिकों को विश्वास हो गया था कि यदि वे कंपनी के खिलाफ विद्रोह कर दें तो उन्हें सफलता मिलने की पर्याप्त संभावना है. अत: वे अवसर की प्रतीक्षा में थे जो कि चर्बी वाले कारतूसों से उन्हें दे दिया.

1856 ई. में सरकार ने पुरानी लोहे वाली बंदूक के स्थान पर नवीन एनफील्ड राइफल का प्रयोग करने का निश्चय किया. ये पहले वाली बंदूक के तुलना में अच्छी थी. इस नवीन राइफल को चलने का प्रशिक्षण डम-डम, अंबाला और सियालकोट में दिया जाना था. इस नई राइफल के कारतूस को इस्तेमाल करने के लिए उसके ऊपरी भाग को मुंह से काटना पड़ता था. जनवरी 1857 ई. में बंगाल सेना में यह अफवाह फैल गई कि चर्बी वाले कारतूस में गाय और सूअर की चर्बी है. सैनिक अधिकारियों ने इस अफवाह की जांच किए बगैर तुरंत इसका खंडन कर दिया. बाद में जांच में ये बात पता चली कि गाय और बैलों की चर्बी वास्तव में ही पुलिस शस्त्रागार में प्रयोग की जाती थी. बड़े पदाधिकारियों के आश्वासनों का सैनिकों पर कोई असर नहीं हुआ. सैनिकों को विश्वास हो गया कि चर्बी वाले कारतूसों का प्रयोग उनका धर्म भ्रष्ट करने का एक कोशिश है.

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