माउंटबेटन योजना क्या थी? विस्तारपूर्वक वर्णन करें

माउंटबेटन की योजना

24 मार्च 1947 ई . को माउंटबेटन ने भारत के वायसराय का पद ग्रहण किया. माउंटबेटन को ब्रिटिश शक्ति को भारत से समेटने के कार्य के लिए भेजा गया था . अतः उन्हें कुछ विशेष शक्तियां भी दी गई थी. इन शक्तियों का प्रयोग और अपने प्रभावशाली व्यक्तित्व से माउंटबेटन अपने इस कार्य को करने में सफल रहे.

माउंटबेटन योजना

माउंटबेटन को भारत का कार्यभार संभालते ही इस बात का एहसास हो गया था कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग में समझौता करना अत्यंत कठिन है. माउंटबेटन ने विभिन्न दलों के नेताओं और प्रांतीय गवर्नरों से विचार-विमर्श किया और सांप्रदायिक दंगों को दृष्टिगत रखते हुए इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि के शक्ति हस्तांतरण के कार्य को एटली की घोषणा में बताई गई अवधि जून 1948 ई. तक नहीं रोका जा सकता. अत: यह कार्य 1947 ई. के अंत तक हो जाना चाहिए. माउंटबेटन को इस बात का भी एहसास हो गया कि भारत की भौगोलिक एकता को कायम रखना संभव नहीं है. माउंटबेटन को इस बात का भी एहसास हो गया था कि पाकिस्तान बनाने की योजना उचित नहीं है और न ही इससे सांप्रदायिक समस्या दूर किया जा सकता है. इससे हिंदू और मुसलमानों के हितों की ही हानि होगी और भारत की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा भी कम हो जाएगी. महात्मा गांधी और कांग्रेस के अन्य नेता भी किसी भी कीमत पर भारत के विभाजन को मानने के लिए तैयार नहीं थे. महात्मा गांधी के भारतीय विभाजन को न मानने पर माउंटबेटन ने पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल को पाकिस्तान बनाने की आवश्यकता के विषय में समझाने का प्रयास किया. प्रारंभ में दोनों नेता भी इस बात को मानने के लिए कदापि तैयार नहीं थे परंतु देश की लगातार बिगड़ती हालात को देखकर इन्होंने भी भारत को विभाजन करने के लिए दुखी मन से स्वीकार कर लिया. भारत में निरंतर सांप्रदायिक दंगे हो रहे थे. माउंटबेटन ने भी यह स्पष्ट कर दिया कि अगर ऐसा ही हालात रहा तो अंग्रेजों को भी भारत में रुके रहने के लिए निवेश होना पड़ेगा. भारत में निरंतर गृह युद्ध की स्थिति उत्पन्न होती जा रही थी. इसे देखकर वी पी मेनन ने भी पंडित नेहरू और सरदार पटेल को समझाया कि गृह युद्ध की अपेक्षा विभाजन स्वीकार कर लेना ही उचित है. सरदार पटेल को भी अब यह विश्वास होने लगा कि यदि विभाजन न किया जाए तो भारत एक नहीं अनेक टुकड़ों में टूट सकता है. अंतरिम सरकार के समय कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के साथ शासन की व्यवहारिक समस्याओं को सामना किया था अब सरदार पटेल को भी यह यकीन हो गया कि यदि शरीर का एक अंग खराब हो जाए तो उससे शीघ्र छुटकारा पाना ही उचित है.

माउंटबेटन योजना

भारत की रक्षा के लिए मुस्लिम लीग को कुछ भाग दे कर उससे छुटकारा पाना ही उचित था. देश कि बिगड़ती हालत के जिम्मेवार अंग्रेज भी थे क्योंकिं उन्होंने निरंतर मुसलमान को ही प्रोत्साहित किया था. इसका मुख्य कारण मुस्लिम लीग कांग्रेस विरोधी संस्था थी. अतः भारतीय नेता सोचते थे कि अंग्रेज मुस्लिम लीग को संतुष्ट किए बिना मानने वाली नहीं है. जिन्ना भी अलग पाकिस्तान के अलावा किसी और बात को करने के लिए तैयार नहीं थे तथा वह अंग्रेजों के प्रोत्साहन से लाभ उठा रहे थे. बहुत से कांग्रेसी नेता भी अपनी मांगों को स्वीकार करवाने के लिए जिन्ना की खुशामद करते रहते थे जिससे वह और भी अभिमानी और हठी हो गए. मौलाना आजाद, सरदार पटेल और अन्य नेताओं ने गांधी जी को जिन्ना से बार-बार मिलने से रोका भी था, किंतु गांधी जी इस बात को यह कर बात डाल देते कि उनका संघर्ष जिन्ना से नहीं वरन अंग्रेजों से है. जिन्ना ने कांग्रेस की इस नीति का लाभ उठाया. जिन्ना को यह भी भ्रम हो गया था कि उसे संतुष्ट किए बिना कांग्रेस को कोई सफलता मिलना कठिन है. ये सब देखकर पंडित नेहरू और सरदार पटेल समझ गए कि जिन्ना अपनी मांग से हटाने वाला नहीं है. अत: भारत की सुरक्षा और स्वतंत्रता के लिए माउंटबेटन की बात मान लेना ही ठीक है. माउंटबेटन स्वयं पंडित जवाहरलाल नेहरू को समझाया कि मुस्लिम लीग और कांग्रेस में पारस्परिक सहयोग संभव नहीं है. अतः पाकिस्तान बनाने को स्वीकार कर शेष भारत को संगठित और शक्तिशाली बनाना ही ठीक है. अब तक नेहरू को भी आभास हो चुका था कि विभाजन के अतिरिक्त इस राजनीतिक गतिरोध को दूर करने का कोई अन्य रास्ता नहीं है. उन्होंने इस बात को स्वीकार करते हुए कहा कि यह स्थितियों की विशेषता है तथा यह महसूस किया जा रहा है कि जिस मार्ग का हम अनुसरण कर रहे हैं उसके द्वारा गतिरोध दूर नहीं किया जा सकता है. हमें देश के विभाजन स्वीकार करना पड़ा. पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने भी कहा आज हमें पाकिस्तान और आत्महत्या में से एक को चुनना है.

माउंटबेटन योजना

मौलाना आजाद और गांधीजी भारत के विभाजन के लिए किसी भी कीमत पर तैयार नहीं थे किंतु पंडित नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल। माउंटबेटन तथा बी.पी. मेनन के समझाने और देश की लगातार बिगड़ती हालात को देखकर वे भी विभाजन के लिए दुखी मन से तैयार हो गए. माइकल ब्रेचर ने लिखा है कि कांग्रेसी नेताओं के सम्मुख सत्ता का आकर्षण भी था. इन नेताओं ने अपनी राजनीतिक जीवन का अधिकतर भाग अंग्रेजी सत्ता का विरोध करके ही बिताया था और अब वे स्वाभाविक रूप से सत्ता के प्रति आकर्षित हो रहे थे. कांग्रेसी नेता सत्ता को चख चुके थे और विजय की इस घड़ी में इससे अलग होने के इच्छुक न थे.

इस प्रकार माउंटबेटन ने अपनी कूटनीति का परिचय देते हुए कांग्रेस के नेताओं को मानसिक रूप से भारत के विभाजन के लिए तैयार किया. तत्पश्चात उसने अपने व्यक्तिगत सहायकों को एक योजना बनाने के लिए कहा. उल्लेखनीय है कि वायसराय के संवैधानिक सलाहकार बी.पी. मेनन को योजना बनाने का कार्य में सम्मिलित नहीं किया गया था. लॉर्ड माउंटबेटन की यह नीति उसकी एक भूल थी क्योंकि जिन्हें यह कार्य सौंपा गया था वे पाकिस्तान बनाने में विश्वास रखने वाले लोग थे. अत: माउंटबेटन के इस योजना का तीव्र विरोध किया गया. नेहरू और जिन्ना दोनों ने ही इसकी आलोचना की. कांग्रेस, पंजाब और बंगाल के विभाजन पर जोर दे रही थी किंतु जिन्ना इसे मानने को तैयार नहीं थे. जिन्ना की यह भी मांग थी कि उसे इसके अलावा पांच-छह प्रान्त और बफर जोन भी मिले.

माउंटबेटन योजना

माउंटबेटन के इस योजना की नेहरू द्वारा कटु आलोचना किए जाने तथा उसमें निहित दोषों की ओर पत्र द्वारा माउंटबेटन को अवगत कराने पर माउंटबेटन ने इस योजना को रद्द कर दिया और दूसरी योजना बनाने के लिए बी.पी. मेनन से कहा. योजना तैयार होने पर माउंटबेटन ने पंडित नेहरू, जिन्ना, पटेल, लियाकत अली खान और सरदार बल्लभ देव सिंह से विचार विमर्श किया. इस योजना में पाकिस्तान बनाना मान लिया गया था. इसे देखकर सिख नेता भी स्वतंत्र सिख राज्य बनाए जाने की मांग की, किंतु माउंटबेटन ने इसे अस्वीकार कर दिया क्योंकि वह शीघ्रता से इस योजना को लागू करना चाहते थे. तत्पश्चात वायस राय माउंटबेटन इंग्लॅण्ड के प्रधानमंत्री से इस बात का विचार-विमर्श करने लंदन चले गए तथा 31 मई 1947 ई. को भारत वापस आए. 2 जून 1947 ई.  को पंडित नेहरू, पटेल, आचार्य कृपलानी, जिन्ना, लियाकत अली खां, अब्दुल निश्तर तथा बलदेव सिंह से विचार-विमर्श किया. पंडित नेहरू ने पूर्णतया सहमत न होते हुए भी भारतीय हित को ध्यान रखते हुए भारत विभाजन की सहमति प्रदान की. कांग्रेस कार्य समिति ने भी इस योजना को स्वीकार कर लिया. कम्मुनिस्ट और अन्य वामपंथी दलों ने इस योजना की कटु आलोचना की क्योंकि इसके द्वारा भारत का विभाजन किया जाना था. जिन्ना भी इस योजना से संतुष्ट नहीं थे लेकिन जब उसे चर्चिल का संदेश मिला कि यदि तुमने यह योजना स्वीकार नहीं की तो अलग पाकिस्तान बनाने का विचार समाप्त हो जाएगा तो उन्होंने भी इस योजना को मान लिया. 3 जून 1947 ई. को इस नई योजना के विषय में माउंटबेटन, नेहरू, जिन्ना और बलदेव सिंह ने इस आकाशवाणी में द्वारा इस योजना की घोषणा की. इसके बाद भारत विभाजन और  स्वतंत्रता की ओर तेजी से अग्रसर होने लगा.

माउंटबेटन योजना की प्रमुख धारा निम्नलिखित थी:

  • संविधान सभा द्वारा परित संविधान भारत के उन भागों पर लागू नहीं होगी जो इसे मानने को तैयार न होंगे.
  • पंजाब और बंगाल की विधानसभा मुस्लिम और गैर मुस्लिम जिलों के आधार पर दो भागों में विभाजित की जाएगी.
  • उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्त में जनमत के द्वारा यह ज्ञात किया जाएगा कि वे भारत के किस भाग के साथ रहना चाहते हैं.
  • असम के सिलहट जिले में भी इस प्रकार के जनमत के द्वारा निर्णय किया जाएगा.
  • सर्वश्रेष्ठता  की शक्ति भारतीय राजाओं को पुन: दे दी जाएगी.

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